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आज ही के दिन अंग्रेजों ने सरेआम दी थी फांसी

Sat, 25 Apr 2015 11:08 PM IST
अशोक द्विवेदी, जलालाबाद
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शहीदों की सरजमीं से अंग्रेजों के खिलाफ  क्रांति का बिगुल फूंकने वाले अहमद यार खां का आज 157वां शहीद दिवस है। देश को आजादी दिलाने वाले यह शहीद भले ही इतिहास के पन्नों में दर्ज हो चुके हों, लेकिन खास मौकों पर उनकी यादें ताजा होकर हमें अतीत के उन दिनों की ओर ले जाती है जब गुलामी के जंजीरों में जकड़े इस देश को आजाद कराने को न जाने कितने नौजवानों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदों को चूम लिया था।
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अतीत के पन्नों को पलटें तो वर्ष 1857 में देश को आजाद कराने को शुरू हुई क्रांति के दौरान जब शाहजहांपुर में इसकी ज्वाला धधकी तब ब्रिटिश सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ  हुए विद्रोह में अहमद यार खां की अहम् भूमिका रही थी। नगर निवासी अहमद यार खां उस दौरान तहसीलदार पद पर तैनात थे। देशभक्ति उनकी रग-रग में बसी हुई थी। इतिहासकारों के अनुसार 1857 के गदर की सूचना मिलने पर अहमद यार खां ने कैदियों को रिहा करके उनके प्रति अपनी सहानुभूति प्रकट की थी। इसके बाद अप्रैल 1858 में बिचपुरिया घाट पर ब्रिटिश सेना के खिलाफ  क्रांतिकारियों द्वारा जब मोर्चा खोला गया तो उस दल में अहमद यार खां भी शामिल थे।
कालिन कैंपवेल के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना ने 26 अप्रैल 1858 को विद्रोह को कुचलते हुए जलालाबाद में प्रवेश किया। इस दौरान ऐसे हालात बने कि अहमद यार खां समेत कई अन्य क्रांतिकारियों को अंग्रेजों के सामने आत्मसमर्पण करना पड़ा। इसके बाद फिरंगियों ने अहमद यार खां को इसका दोषी मानते हुए बिना किसी सुनवाई के 28 अप्रैल 1858 को उन्हेें नगर के बारहपत्थर चौराहे पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया था।
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नगर के रामताल रोड पर शहीद अहमद यार खां की स्थित मजार न केवल उनकी शहादत की मूक गवाह है बल्कि यह स्थान हमें यह भी याद दिलाता है कि आज हम लोग जिस स्वछंद माहौल में सांस ले रहे हैं उसके लिए न जाने कितने नौजवानों ने सीने पर गोलियां खाईं और न जाने कितनों ने हंसते-हंसते फांसी के फंदों पर झूलकर अपने प्राणों का उत्सर्ग कर दिया।


उपेक्षित है शहीद की मजार
देश को आजादी दिलाने में अपने प्राणों तक की परवाह न करने वाले शहीदों की यादें सहेजने को लेकर जहां हमारी सरकारें उदासीन रवैया अपनाये हुए हैं वही तमाम लोग भी ऐसे हैं जिन्हें अपने तुच्छ स्वार्थ के आगे महापुरुषों की निष्ठा तक की परवाह नहीं। इसका जीता जागता उदाहरण है नगर स्थित शहीद अहमद यार खां की मजार जो सरकार की उदासीनता के चलते उपेक्षित पड़ी हुई है। सपा के बीते शासन मे प्रमुख सचिव के निर्देश पर इसका सौंदर्यीकरण कराने को भेजा गया प्रस्ताव फाइलों में गुम होकर रह गया। पालिका द्वारा सड़क से मजार तक पक्का रास्ता बनाने को किये गए प्रयास को स्थानीय लोगों के विरोध नेे फलीभूत नहीं होने दिया। अभी कुछ माह पहले विरोध के बाद भी पालिका की ओर से मजार के आसपास पक्का चबूतरा तथा नाली का निर्माण कराया गया।
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