साहित्याकाश में जनपद को पहचान दिलाने वाले ओज कवि दामोदर स्वरूप विद्रोही की सोमवार को पुण्यतिथि है। विद्रोही अपने शहर और प्रशंसकों की नस-नस से वाकिफ थे, इसलिए उन्होंने समय-समय पर नगर में कवि सम्मेलनों के ऐसे आयोजन कराए जो आज भी याद किए जाते हैं। साहित्यप्रेमियों का तो यहां तक कहना है कि जो कवि सम्मेलन विद्रोही जी करा गए वैसे अब कहां हो पाते हैं।
स्वभाव के अनुसार ही उनका नाम भी था विद्रोही। उन्होंने अपने जीवन में कभी उसूलों से समझौता नहीं किया। स्वाभिमानी विद्रोही ने जीएफ कॉलेज की नौकरी की भी परवाह नहीं की। कुछ दिन काम करने के बाद नौकरी का भी त्याग कर दिया। उनके काव्य संग्रहों में गुलाम शैशव, दिल्ली की गद्दी सावधान, समय के दस्तावेज, त्रिधारा, हार हमारी जीत तुम्हारी, कसक आदि खासे उल्लेखनीय हैं। उनके स्वभाव से परिचित रहे समकालीन कवि डॉ. उर्मिलेश ने एक बार विद्रोही जी के लिए लिखा था कि-
तन की फरमाइशों के हाथों में तुमने विद्रोही मन नहीं बेचा,
थी जरूरत तुम्हें, बहुत लेकिन धन की खातिर सृजन नहीं बेचा।
आज भी जनपद की धरती पर कहीं भी कवि सम्मेलन का मंच सजे, किसी न किसी रूप में जब तक विद्रोही का नाम उसमें नहीं जुड़ता, तब तक उसे पूर्णता प्राप्त नहीं होती। अतिथि कवि विद्रोहीजी की धरती को नमन करके ही काव्यपाठ शुरू करना अपना धर्म समझते हैं।