साठा धान की खेती, बीज खरीद और जनपद की सीमा में इसे लाने और ले जाने पर लगे प्रतिबंध को मुंह चिढ़ाता पुवायां तहसील क्षेत्र में बड़े भूभाग में इसकी फसल लहलहा रही है। धान की यह किस्म पानी और पर्यावरण का दुश्मन है। इसके बावजूद इसकी खेती में कोई कमी नहीं आई है। पिछले वर्ष बेचे गए गन्ने का भुगतान बमुश्किल मिल पाने, वर्तमान सत्र का भुगतान न दिए जाने, गन्ने की फसल में साल दर साल रोगों की अधिकता आदि ने किसानों को गन्ने से दूर करना शुरू कर दिया है। कुछ वर्ष पहले तक धान और गेहूं की फसल में कम लाभ को देखते हुए किसानों ने खीरा, खरबूजा, ककड़ी, लौकी, टमाटर, आलू की खोती बड़े पैमाने पर शुरू कर दी थी। मगर कुछ बड़े फार्मर ने साठा धान की खेती शुरू की थी। इसके बाद तमाम छोटे किसानों ने भी साठा धान लगाना शुरू कर दिया। किसानों का कहना है कि साठा व्यापारी घरों से उठाकर ले जाते हैं और नगद भुगतान भी मिलता है।
पर्यावरण और पानी का दुश्मन है साठा
पुवायां। साठा धान के बढ़ते क्षेत्रफल ने भूगर्भीय जलस्तर काफी नीचे ढकेल दिया है। आशंका व्यक्त की जा रही है कि यदि साठा का क्षेत्रफल इसी गति से बढ़ता रहा तो पीने तक के लिए पानी का संकट खड़ा हो जाएगा। एक अनुमान के अनुसार तहसील क्षेत्र के कुल 30 प्रतिशत भाग पर साठा धान की फसल खड़ी है। मानना यह है कि साठा धान साठ दिन में तैयार हो जाता है। मगर इसके तैयार होने में लगभग 90 दिन लगते है। जमीन से ज्यादा लाभ लेने की प्रवृत्ति के चलते वर्ष में धान की दो और गेहूं अथवा आलू की एक फसल होने लगी है। इससे भूमि की उर्वरा शक्ति तो कम हो ही रही है, सिंचाई के लिए पानी का जलस्तर लगातार गिर रहा है। साठा धान की फसल ओजोन परत के लिए काफी नुकसानदायक है। ओजोन परत का लगातार क्षरण होने से पर्यावरण और मानव जीवन खतरे में पड़ सकता है। महंगाई के इस युग में वैज्ञानिक दो से ज्यादा फसलें उगाने को बुरा नहीं मानते हैं। उनका मानना है कि यदि साठा का क्षेत्रफल बढ़ता रहा तो एक दिन जमीन बंजर हो जाएगी।
पंजाब और हरियाणा में है प्रतिबंध
पंजाब और हरियाणा में भी साठा धान की खेती बड़े क्षेत्रफल में की जाती थी। इससे हो रहे नुकसान हो देखते हुए पंजाब सरकार ने 2009 में पानी एक्ट लागू कर दिया। इसके तहत 10 जून से पहले धान नहीं लगाया जा सकता है। हरियाणा में कोई भी किसान 10 मई से पहले धान की नर्सरी तैयार नहीं कर सकता है।
ये हैं समस्याएं
भूगर्भ जलस्तर गिरने से पानी का संकट
लगातार एक जैसी फसल पैदा करने के कारण ऊसर होने का खतरा
बिजली की अधिक खपत
ओजोन परत को हानि
कीटनाशकों के कारण मित्र कीटों की हानि
पर्यावरण और मानव जीवन को खतरा
ऐसे हो सकता है समाधान
किसानों का साठा धान से नुकसान के प्रति जागरूक किया जाए।
अन्य फसलों पर अनुदान देकर उन्हें पैदा करने को प्रेरित किया जाए।
फसलों की बिक्री और उठान का उचित व्यवस्था हो
रसासयनिक खादों का प्रयोग कम किया जाए।
दलहनी और तिलहनी फसलों का उत्पादन बढ़ाया जाए।
तीन गांवों के लोगों ने नहीं लगाया साठा
मकसूदापुर/ बंडा। साठा धान से हो रहे नुकसान से किसान जागरूक होने लगे हैं। बंडा गांव पिपरिया मझरा के बड़े किसान जसविंदर सिंह साठा के खिलाफ कई वर्ष से मुहिम चला रहे हैं। उनका कहना है कि भूमि के लिए क्राप रोटेशन बहुत ही जरूरी है। इससे जैव संरक्षण के साथ ही भूमि कर उर्वरा शक्ति का भी विकास होता है। फरवरी माह में गांव नटिउरा के प्रधान सुरजीत सिंह की अध्यक्षता में हुई किसानों की बैठक में गांव अजोधापुर, नटिउरा और शांकड़ नहर के किसानों की बैठक कर तय किया गया था कि तीनों गांवों के किसान साठा धान नहीं लगाएंगे। इसके लिए बाकायदा स्टांप पेपर पर लिखा पढ़ी की गई। तय हुआ था कि जो भी किसान समझौते का उल्लंघन करके साठा धान की पौध डालेंगे, उसे खेत में ही जोत दिया जाएगा। सुरजीत सिंह ने कहा कि लगातार फसल उगाने और रसायनिक खादों और कीटनाशकों के प्रयोग से मित्र कीट भी मर जाते हैं। जमीन भी जहरीली होती जा रही है। साठा धान लगाने से खतरनाक कीट ‘ब्रादन हार्पर’ को भोजन मिलता रहता है और यह ज्यादा ताकतवर होकर धान की मुख्य फसल को भारी नुकसान पहुंचाता है।
बंडा पुलिस ने एक को पकड़कर छोड़ा
मकसूदापुर/ बंडा। डीएम के रोक लगाने के बाद भी बड़े फार्मर साठा धान लगवाने से बाज नहीं आ रहे हैं। रविवार को बंडा क्षेत्र में साठा धान लगवाया जाना जारी रहा। गौरतलब है कि शनिवार को डीएम ने 30 जून तक के लिए साठा धान के बीज की बिक्री, पौध डालने, रोपाई कराने, सिंचाई आदि पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है, लेकिन कुछ फार्मर डीएम के आदेश का पालन नहीं कर साठा धान से मोटी कमाई करने के लालच में धान लगवाने में डटे हैं। एक सूचना पर पुलिस ने गांव कुंवरपुर में धान लगवा रहे एक किसान को पकड़ लिया। किसान को पूरे दिन हवालात में रखा गया, लेकिन शाम को बिना कार्रवाई के छोड़ दिया गया। उधर गांव गहलुइया में भी साठा धान का लगवाया जाना जारी रहा। एक बड़े फार्मर ने तो खेत में खड़े होकर धान लगवाया और श्रमिकों को भरोसा दिलाया कि उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने दी जाएगी। एसओ राजेश सिंह ने बताया कि वह थाने पर नहीं हैं। साठा धान लगवाते समय किसी को पकड़कर बाद में छोड़े जाने की जानकारी उन्हें नहीं है।