जलालाबाद के बहुचर्चित बड़े हरेवा मामले में किशोरी को उसकी इच्छानुसार रहने को स्वतंत्र करने वाले एसीजेएम प्रथम के आदेश को द्वितीय सेशन कोर्ट ने बृहस्पतिवार को एक रिवीजन की सुनवाई करते हुए खारिज कर दिया। अपने आदेश में अपर सेशन जज ने कहा है कि निचली अदालत ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की नजीरों के आधार पर नाबालिग लड़की को उसकी इच्छानुसार स्वतंत्र तो घोषित कर दिया, किंतु उसकी इच्छा न तो जानने की कोशिश की और न ही उसकी इच्छा का कोई उल्लेख ही अपने आदेश में किया है। सेशन कोर्ट ने लड़की सुपुर्दगी पर पुन: सुनवाई के लिए एसीजेएम प्रथम कोर्ट को आदेश करते हुए सुनवाई की तारीख 13 जुलाई नियत की है।
बता दें कि हरेवा गांव का संतोष प्रेम प्रसंग के चलते एक लड़की को ले गया था। इस मामले में लड़की पक्ष ने संतोष के विरुद्ध अपहरण की धाराओं में जलालाबाद थाने पर रिपोर्ट लिखाई थी। पुलिस ने लड़की को बरामद करके एसीजेएम प्रथम की अदालत में पेश किया था। लड़की की दादी नन्हीं और संतोष की ओर से उसके चाचा सतीश ने लड़की को अपनी-अपनी सुपुर्दगी में लेने के लिए कोर्ट में प्रार्थना पत्र दिया था। कोर्ट ने इन दोनों के प्रार्थना पत्र को 27 मई को खारिज करते हुए लड़की को अपनी इच्छानुसार रहने के लिए स्वतंत्र घोषित कर दिया था। इसी आदेश से क्षुब्ध होकर सरकार की ओर से शासकीय अधिवक्ता ने जिला जज के न्यायालय में रिवीजन दायर किया था।
रिवीजन में नए सिरे से विचार करते हुए लड़की को उसकी प्राकृतिक संरक्षक दादी नन्हीं देवी की सुपुर्दगी में देने की मांग की गई थी। संतोष ने भी कोर्ट से लड़की को सुपुर्दगी में देने की मांग की थी। इस पर सुनवाई करते हुए अपर सेशन जज द्वितीय पीके चौरसिया ने एसीजेएम प्रथम के आदेश को बृहस्पतिवार को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अपने आदेश कहा कि जो हाईकोर्ट की नजीरें पेश की गईं हैं उनके अनुसार नाबालिग लड़की की इच्छा जानना तथा लड़की के विवाह करने से उत्पन्न परिस्थितियों आदि बिंदुओं पर विचारण भी महत्वपूर्ण था किंतु निचली कोर्ट ने इस बात का ध्यान नहीं रखा। इलाहाबाद हाईकोर्ट की मोबीना बनाम उत्तर प्रदेश राज्य के निर्णय में यह मत भी व्यक्त किया गया है कि बालिग हो चुकी लड़कियों को भी उनकी इच्छानुसार कहीं भी जाने का आदेश नहीं दिया जा सकता क्योंकि बालिग लड़की को भी स्वतंत्र और असुरक्षित नहीं छोड़ा जा सकता। पीड़िता का हित सर्वोच्च है।
इस मामले में पीड़िता नाबालिग है। यदि लड़की को इच्छानुसार स्वतंत्र छोड़ने का आदेश होता है तो विवेचक उसे किसी भी स्थान पर असहाय अवस्था में छोड़ सकता है। ऐसी दशा में लड़की के हित और सुरक्षा का दायित्व न्यायालय का है। लिहाजा सेशन कोर्ट ने एसीजेएम प्रथम कोर्ट के लड़की को स्वतंत्र घोषित करने के 27 मई 2015 आदेश को खारिज कर दिया।