खेती-किसानी की परिस्थितियों को देखते किसानों के हालात भले ही निरीहों जैसे हों, उनकी पहचान अपनी मेहनत, हिम्मत और जुझारूपन से बनती है। ताप, धूप, बारिश, लू, शीत आदि कैसा भी मौसम हो, किसान विपरीत हालातों में भी फसल तैयार करने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगाते हैं। ऐसा भी नहीं है कि मौसम ने पहली बार दगाबाजी की है। पहले भी तमाम फसलें सूखे और बाढ़ की भेंट चढ़ती रहीं हैं, लेकिन यह पहला मौका है, जब फसली नुकसान से जिले में 13 किसानों की सांसें थम चुकी हैं।
किसानों की मौतों का यह सिलसिला कब थमेगा, यह तो आने वाला वक्त बताएगा, लेकिन इतना तय है कि फसलों की बरबादी ने इस बार किसानों को अंदर तक तोड़कर रख दिया है। सच तो यह है कि जिले के कम जोत वाले अधिसंख्य लघु और सीमांत किसान एक ओर कर्ज के दुष्चक्र तो दूसरी ओर भ्रष्ट तंत्र के चंगुल मेें फंसे है। इस चक्रव्यूह से निकलने की छटपटाहट में उन्हें दूर तक उम्मीद की कोई किरण नजर नहीं आती।
उनमें घर कर रहा निराशा का भाव कहीं खुदकुशी तो कहीं सदमे से रोजाना मौत का नया किस्सा बनकर सामने आ रहा है। सरकारी मुआवजा बंटने का दौर शुरू हो जाने पर भी सर्वे के नाम पर की गई मनमानी को किसानों की मौतों का कारण माना जा रहा है। प्रशासन भले ही इन्हें स्वाभाविक मौतें बताकर अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहा हो, किसान इससे सहमत नहीं हैं।
पुवायां क्षेत्र के उन्नतशील काश्तकार मुरारी दीक्षित के अनुसार जिजीविषा के धनी किसानों को सरकारी तंत्र से राहत का भरोसा होता तो हालात आज जैसे भयावह नहीं होते। उनका कहना है कि बुवाई के लिए महंगा बीज, सिंचाई के लिए महंगा डीजल, कीट-रोगों से बचाव के लिए महंगे कीटनाशक लगाने पर भी कुदरत धोखा देती है, तब सरकारी तंत्र से ही सहारा मिलने की उम्मीद बचती है, लेकिन तंत्र ही बेढब कार्यशैली अपनाने लगे तो हाथ लगता है केवल घना अवसाद। यही डिप्रेशन किसानों को मौत की ओर धकेल रहा है।
यह बात काफी हद तक सही भी है, क्योंकि जिन गावों में किसानों की मौत से मातम पसरा, वहां कायदे से सर्वे नहीं हुआ और हुआ भी तो मरने वालों को जिंदा रहते तसल्ली देने लायक नहीं हो पाया। अगर समय से फसली क्षति की भरपाई का भरोसा मिल जाता तो फसली नुकसान का सदमा किसानों के लिए जानलेवा नहीं बनता। सर्वे में मनमानी को लेकर लगातार सवाल खड़े हो रहे हैं। अफसर ऐसी शिकायतों पर सर्वे के सत्यापन की बात कर रहे, लेकिन नुकसान के आकलन में गड़बड़ी करने वाले किसी भी कर्मचारी के विरुद्घ कार्रवाई नहीं हुई। ऐसे में किसानों को प्रशासन की नीयत में खोट नजर आए तो गलती किसकी है? किसानों की?
एडीएम (एफआर) बोले, सदमे से मौत सिर्फ सहायता पाने का नाटक
फसली बर्बादी से भले ही किसानों के दिल बैठ रहे हों, ऐसी मौतों को प्रशासन सिर्फ सरकारी सहायता पाने का नाटक जैसा मान रहा है। राहत वितरण की निगरानी में जुटे एडीएम वित्त एवं राजस्व पीके श्रीवास्तव कहते हैं, मरने वाले कई किसानों की ‘नार्मल डेथ’ हुई है, इसलिए उनका पोस्टमार्टम भी नहीं कराया गया, लेकिन ऐसी मौतों को जान-बूझकर फसली क्षति से जोड़ा जा रहा है। एडीएम के अनुसार फरवरी के अंत से लेकर मार्च के पहले सप्ताह तक हुई बारिश में फसलों को नुकसान हुआ, लेकिन सदमे से मौतें अब हो रही हैं।
सुंदर लाल के आश्रितों
को मिलेंगे पांच लाख
निगोही क्षेत्र के गांव ढकिया तिवारी निवासी सुंदर लाल की मौत को प्रशासन ने फसली सदमे का नतीजा मान लिया है। सुंदर लाल के आश्रितों को तिलहर के एसडीएम ने आपदा राहत कोष से पांच लाख रुपये देने की संस्तुति की है। प्रशासनिक सूत्रों के अनुसार फांसी लगाकर मरे लालपुर की बीडीसी सदस्य के पति अशोक के नाम राजस्व अभिलेखों में कोई कृषि भूमि दर्ज नहीं है। बावजूद इसके अशोक के चार छोटे बच्चों को देखते आश्रितों को मुख्यमंत्री सहायता कोष से दो लाख रुपये दिलाने की संस्तुति की गई है।
4734 किसानोें को मिले
2.17 करोड़ रुपये
राहत वितरण अभियान के तहत रविवार को जिले की विभिन्न तहसीलों में 2050 प्रभावित किसानों को 1.10 करोड़ की राहत सहायता के चेक दिए गए। इन्हें मिलाकर अब तक 4734 किसानों को दो करोड़ 16 लाख 92 हजार 91 रुपये की राहत राशि दी जा चुकी है।