परौर। क्षेत्र में रामगंगा के कटान से प्रभावित गांव मोहनपुर और नरायननगला के लोगों को रामगंगा पार खेतों तक जाने के लिए सिर्फ लकड़ी की एक नाव नसीब नहीं हो सकी। ऐसे में ग्रामीण पीपों को काटकर जुगाड़ से बनाई गई नाव के सहारे नदी पार करने को मजबूर हैं, जबकि गत वर्ष पीपों की नाव बीच धार में पलटने से एक बालक की डूबकर मौत हो चुकी है।
चुनाव के दौरान वोटों की खातिर इन गांवों के चक्कर काटने वाले जनप्रतिनिधि भी ग्रामीणों की इस समस्या को लेकर उदासीन बने हुए हैं।
बता दें कि परौर क्षेत्र के तमाम गांवों के ग्रामीणों की रामगंगा के पार खादर क्षेत्र में कृषि जमीनें हैं और वह वहां फसलें उगाते हैं। फसलों की देखभाल के लिए परौर, मोहनपुर, बिचपुरी, नरायननगला आदि के ग्रामीणों को रोजाना नदी पार करनी पड़ती है। पानी कम होने पर ग्रामीण पालतू पशुओं की पूंछ पकड़कर उसी के सहारे तैरते हुए नदी पार कर लेते हैं, लेकिन बारिश शुरू होने पर रामगंगा का जलस्तर बढ़ने के साथ उन्हें नाव की जरूरत पड़ती है। इसके लिए तटवर्ती गांवों के लोग प्रशासन से बिचपुरी घाट पर नाव की व्यवस्था कराने को लगातार मांग कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोई सुनवाई नहीं हो रही।
यही नहीं, चुनाव के दौरान वोटों की खातिर इलाके के गांवों में आने वाले जन प्रतिनिधियों से भी रामगंगा में नाव डलवाने की गुहार लगाई, लेकिन चुनाव जीतने के बाद किसी भी नेता ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। मजबूरन, ग्रामीणों ने रामगंगा पार जाने के लिए पीपों को काट कर एक कामचलाऊ छोटी नाव बना ली है, लेकिन उस पर बैठना खतरे से खाली नहीं है।
परौर निवासी सेना के सेवानिवृत्त सूबेदार मेजर धर्मेंद्र प्रताप सिंह, मोरपाल भोजवाल, रमेश गुप्ता, दोदराम कुशवाहा, कन्हैया लाल कुशवाहा, सीताराम कश्यप, रामेश्वर दयाल आदि ने रामगंगा में बिचपुरी अथवा मोहनपुर के पास नाव डलवाने की अधिकारियों से गुहार लगाई है।