शाहजहांपुर। घर में होली मिलने न आने से नाराज दोषियों ने अनुसूचित जाति के व्यक्ति के पूरे परिवार को मारा-पीटा। इसके बाद उनके घरों में आग लगा दी। इस मामले में दोषी पिता और दो पुत्रों समेत छह लोगों को अदालत ने आजीवन कारावास की सजा सुनाई है।
जैतीपुर के गांव मुड़िया निवासी श्रीपाल ने आठ मार्च 2004 को थाने में तहरीर दी थी। बताया था कि सात मार्च की रात करीब 10 बजे वह अपने परिवार के साथ घर में थे। गांव का ब्रजपाल यादव, उसके बेटे जगदीश और नरवीर के अलावा बलवीर, सुरेंद्र यादव, रोशन उर्फ डेलू हाथों में लाठी-डंडे, असलहे लेकर उनके दरवाजे पर आ धमके। जातिसूचक संबोधन के साथ उन्होंने कहा कि वह उन लोगों के यहां होली मिलने क्यों नहीं आया?
वे लोग गाली देने लगे तो श्रीपाल ने मना किया। इस पर उन लोगों ने उसे लात-घूसों से पीटना शुरू कर दिया। डेलू ने बंदूक की बट से उन्हें मारा। उसने शोर मचाया तो पत्नी सहदेई, बेटी किरन, भतीजी रेखा, भाई रामकुमार और उसकी पत्नी रामश्री बचाने आए। हमलावरों ने उन लोगों पर भी हमला कर दिया। डेलू ने कहा कि इन लोगों का घर फूंक दो। इसके बाद ब्रजपाल ने जेब से माचिस निकालकर आग लगा दी, जब उसके घर का सामान जलने लगा तो ब्रजपाल व अन्य लोगों ने कहा कि जो भी आग बुझाने आएगा, उसे गोलियों से भून दिया जाएगा।
आग से श्रीपाल, भाई रामकुमार और मेवाराम के घर की संपत्ति जलकर नष्ट हो गई। हमलावरों ने धमकाया कि घटना की रिपोर्ट लिखाने जो भी थाने जाएगा, उसे और उसके परिवार को खत्म कर दिया जाएगा। श्रीपाल के मुताबिक, ब्रजपाल आदि ने उनके आने-जाने का रास्ता भी रोके रखा। किसी तरह से छिपते हुए श्रीपाल रिपोर्ट लिखाने थाने पहुंचे। पुलिस ने एससी/एसटी एक्ट व अन्य धाराओं में रिपोर्ट दर्ज कर विवेचना के बाद आरोपपत्र अदालत भेजा। विशेष न्यायाधीश एससीएसटी एक्ट गरिमा सिंह ने जगदीश, नरवीर, बलवीर, रोशन उर्फ डेलू, सुरेंद्र यादव और ब्रजपाल को दोषी पाया। सभी दोषियों को आजीवन कारावास की सजा सुनाई।
-
कोर्ट ने कहा- पीड़ित को जाति के आधार पर माना हीन
-कोर्ट ने फैसले में कहा कि प्रकरण के तथ्य और परिस्थितियों से स्पष्ट है कि दोषियों ने यह घटना इस आधार पर की है कि वे स्वयं को श्रेष्ठ जाति का समझते थे तथा वादी को उनकी जाति के आधार पर हीन मानते थे। साक्ष्य से स्पष्ट है कि दोषी की वादी पक्ष से कोई निजी रंजिश अथवा विद्वेष नहीं था। घटना करने के पीछे दोषियों की मानसिकता हमारे समाज में प्रचलित जातिगत व्यवस्था में दूसरे पक्ष को निर्बल तथा स्वयं को श्रेष्ठ मानते हुए किया गया कृत्य है। घटना करने के तरीके से साफ है कि दोषी यह स्थापित करना चाहते थे कि वे जाति विशेष होने के कारण वादी पक्ष से श्रेष्ठ हैं तथा उनकी श्रेष्ठता को चुनौती देने वाले को गंभीर परिणाम भुगतने होंगे।