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बिना फिटनेस की 73 स्कूली बसों को सड़क पर दौड़ाने पर रोक

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शाहजहांपुर में स्कूली बस में बैठने जाते बच्चे । संवाद - फोटो : SHAHJAHANPUR
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शाहजहांपुर। जिन बसों में आपके नौनिहाल पढ़ने के लिए स्कूल जा रहे हैं, वे बसें ही सुरक्षित नहीं हैं। कोरोना काल में दो साल तक विद्यालयों के बंद रहने के कारण स्कूल बसों के मानक ही पटरी से उतर गए हैं। गाजियाबाद में हुई घटना के बाद परिवहन विभाग ने जांच शुरू कराई तो 72 स्कूलों की 73 बसें बिना फिटनेस के दौड़ते हुए मिलीं। एआरटीओ ने उनके सड़क पर चलने पर रोक लगा दी है।
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दूसरी तरफ जांच में 35 प्रतिशत बसों के मानक पूरे नहीं मिले हैं। स्कूल संचालक बसों के नाम पर बच्चों की जिंदगी के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। परिवहन विभाग ने स्कूल संचालकों से मानक पूरे करने के निर्देश दिए हैं। जनपद मे 72 स्कूलों का संचालन होता है, जहां पर बसों और वैन से बच्चे स्कूल आते हैं। कुछ स्कूलों में अच्छी हालात में बसे हैं, जबकि ग्रामीण इलाके के स्कूलों की बसों की हालत काफी खस्ताहाल है। फिर भी उन्हें सड़कों पर दौड़ाकर बच्चों को लाने का काम किया जा रहा। बसों में फास्ट ट्रैक बाक्स से लेकर अग्निशमन यंत्र तक नहीं लगे हैं।
गाजियाबाद समेत कई जिलों में स्कूली बच्चों के साथ बसों में हुई दुर्घटना के बाद शासन ने गंभीरता से लेते हुए नियमों का पालन कराने के निर्देश दिए तो बसों के मानकों की पोल खोलकर सामने आ गई। एआरटीओ ने शहर से लेकर देहात तक के स्कूलों की बसों के मानक चेक किए तो कलई खुल गई। जनपद में रजिस्टर्ड 414 बसों में 73 बसों का फिटनेस प्रमाण पत्र अवैध मिला। बसों की फिटनेस न होने के कारण एआरटीओ ने चालान करने के साथ ही उनके सड़क पर चलने पर रोक लगा दी है। कुछ विद्यालयों में ड्राइवर यूनीफार्म में नहीं मिले। अहम बात यह है कि 35 प्रतिशत बसें मानक ही पूरे नहीं कर रही हैं, जिनके लिए अधिकारियों ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं।
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बड़ी संख्या में प्राइवेट वैन चल रहीं स्कूलों में
जनपद के स्कूलों में बड़ी संख्या में वैन संचालित हो रही हैं। इन वैनों में भी मानक पूरे नहीं होते हैं। बच्चे को मानक से ज्यादा बैठाकर दौड़ाया जा रहा। अधिकारियों की मानें तो उनके यहां मात्र 16 वैन ही स्कूल के नाम पर रजिस्टर्ड हैं। शेष वैन प्राइवेट हैं, जिन्हें स्कूलों में चलाया जा रहा है।
कोरोना के कारण बसों के मानक पूरे नहीं हो पाए
2019 से कोरोना के दस्तक देने के बाद से व्यवस्था पटरी से उतर गईं। बच्चों के स्कूलों में नहीं आने और फीस के जमा नहीं होने के कारण संचालकों ने मानक ही पूरे नहीं कराए हैं। दो साल तक स्कूलों के बंद रहने के कारण फिटनेस और अन्य मानक पूरे करने की तरफ स्कूल संचालकों का ध्यान ही नहीं गया।
95 प्रतिशत लाइसेंस वाले चालक ही दौड़ा रहे बसें
-जनपद में संचालित होने वाले स्कूली वाहनों को चलाने वाले 95 प्रतिशत चालकों के पास लाइसेंस हैं, सिर्फ पांच प्रतिशत चालक ही होंगे, जिनके पास लाइसेंस नहीं हैं। स्कूल संचालकों ने डीएल को लेकर सबसे ज्यादा फोकस किया है। बिना डीएल के वाहनों को चलाने की अनुमति प्रशासन भी नहीं दे रहा है।
73 बसों की फिटनेस नहीं मिलने पर उनके सड़क पर चलने पर रोक लगा दी गई। बड़े स्कूलों की बसों की स्थिति उतनी खराब नहीं है, जितनी ग्रामीण इलाकों की बसों का है। सुदूर गांव के स्कूल बसें मानक पूरे नहीं कर रही हैं। जनपद के 35 प्रतिशत स्कूली वाहन मानक पूरे नहीं कर रहे हैं, जिसके चलते स्कूल संचालकों को जरूरी दिशा-निर्देश दिए गए हैं। महेंद्र प्रताप सिंह, एआरटीओ प्रशासन
स्कूल संचालकों की बैठक में बता दिया था कि समय से पहले मानक को पूरा कर लिया जाए। बच्चों को अच्छी शिक्षा देने के साथ ही प्रबंधकों और प्रधानाचार्यों का फर्ज है कि बच्चों की सुरक्षा के लिए स्कूल बसों को सुरक्षित बनाएं। तीन दिन के बाद फिर बैठक होना है। उसमें स्कूली बसों के मानक को लेकर फीडबैक लिया जाएगा। -विपिन अग्रवाल, अध्यक्ष इंडीपेडेंट स्कूल एसोसिएशन
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