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वतन पर मर मिटने वालों की निशानियां उपेक्षित

Sun, 11 Aug 2013 05:37 AM IST
Shahjahanpur
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0 स्वाधीनता की तमाम गौरव गाथाएं समेटे है शहीदों की सरजमीं
शाहजहांपुर। जंग-ए-आजादी के दौर में कई दशक तक क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र बिंदु बने रहे रूहेलखंड के इस जिले में न केवल बलिदानियों की गाथा संजोए तमाम ऐतिहासिक स्थल व जीवित प्रतिमानों में शामिल स्वाधीनता सेनानी आज भी गौरवशाली अतीत को बयां करते नहीं थकते, लेकिन प्रशासनिक और सामाजिक स्तर पर उनकी उपेक्षा यह साबित करती है कि नई पीढ़ी के लिए आजादी का इतिहास प्रेरणा लेने के बजाय केवल पढ़ने भर की विषय वस्तु रह गई है। यहां प्रस्तुत है आजादी का स्थानीय इतिहास, स्वाधीनता की उपेक्षित धरोहरें और सेनानियों और उनके आश्रितों की पीड़ा।
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आजादी का स्थानीय इतिहास
1857 गदर से लेकर 1942 की अगस्त क्रांति तक जनपद के क्रांतिकारियों ने स्वाधीनता की लड़ाई में बढ़-चढ़कर सहभागिता की है। 1857 के गदर में मौलवी अहमद उल्ला शाह और नौ अगस्त 1925 को हुए काकोरी कांड में पंडित राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाक उल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह ने अपना नाम अमर शहीदों में शामिल कराकर जनपद को इतिहास के पन्नों में दर्ज कराया। वहीं नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी द्वारा छेड़े गए अंग्रेजो भारत छोड़ो अभियान में तमाम बुजुर्गों और किशोरों ने देश का झंडा ऊंचा करते हुए अंग्रेजों से लोहा लिया और उनकी चुनौतियों को स्वीकारते हुए जेलें भरीं।
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गदर के दौरान मौलवी ने क्रांतिकारियों का नेतृत्व करते हुए अंग्रेजों और उनका साथ देने वालों की नाक में दम कर रखा था। 15 जून 1857 को पुवायां के तत्कालीन राजा जगन्नाथ सिंह और उनके भाई बल्देव सिंह तथा कोमल सिंह से तीन घंटे तक लड़ाई चली। इस बीच मौलवी अपने दो साथियों के साथ शहीद हो गए।
बाद में बल्देव सिंह के आदेश पर उनका सिर काट लिया गया और कटे सिर को राजा स्वयं कपड़े से ढककर हाथी पर बैठकर शहर में तत्कालीन कलेक्टर जीपी मनी के आवास पर लाए, ताकि शहीद पर घोषित 50 हजार का इनाम लिया जा सके। मौलवी के सिर को कोतवाली गेट पर टांग दिया गया।
नौ अगस्त 1925 को अंग्रेजों को सबक सिखाने के लिए पंडित राम प्रसाद बिस्मिल ने रणनीति बनाकर उनका सरकारी खजाना लूटा। योजना के मुताबिक 8-डाउन सवारी गाड़ी पर दस क्रांतिकारियों की टीम वेश बदल कर बैठ गई। लखनऊ से पहले काकोरी स्टेशन पर बिस्मिल के साथी अशफाक उल्ला खां, चंद्रशेखर आजाद, राजेंद्र लाहिणी, मुकुंदी लाल, मन्मथ नाथ गुप्त, वनवारी लाल, शचींद्र नाथ बख्शी, मुरारी लाल और कुंदन लाल ने ट्रेन रोककर भारी-भरकम संदूक उतार कर खजाना लूट लिया।
इस कांड में शामिल और साजिश रचने के आरोप में बिस्मिल, अशफाक तथा रोशन को 19 दिसंबर 1927 को गोरखपुर, इलाहाबाद व फैजाबाद जेल में फांसी पर लटका दिया गया। इसी तरह नौ अगस्त 1942 को महात्मा गांधी द्वारा छेड़े गए अंग्रेजो भारत छोड़ो अभियान में भी यहां के युवा पीछे नहीं रहे।
इस अभियान में शामिल मन्नीलाल खन्ना उनके भाई बसंतलाल खन्ना, मुन्नालाल गुप्ता, बाबूराम मुनीम, राम किशोर कपूर, ओम प्रकाश सिंह, विशंभर दयाल अवस्थी, श्याम सुंदर लाल, विवेकानंद, उमा देवी, श्याम सिंह बागी, गार्गीदीन, जानकी प्रसाद, नजीर खां, मुक्ता प्रसाद आदि पर मुकदमा चला और सजा सुनाई गई।
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आजादी की लड़ाई के उपेक्षित प्रतिमान
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काकोरी के शहीदों की प्रतिमाएं
काकोरी कांड में फांसी दिए जाने केबाद शहीद पं. राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकउल्ला खां और ठाकुर रोशन सिंह की प्रतिमाएं नगरपालिका परिसर में कई दशक पूर्व स्थापित की गईं। शहीद प्रतिमाएं केवल राष्ट्रीय पर्वों पर ही सम्मान पाती हैं। प्रतिमाओं पर पक्षी बैठकर उन्हें गंदा नहीं करें, इसके लिए उन पर छतरी लगाने की मांग एक दशक से विभिन्न संगठन कर रहे, लेकिन कोई सुनने वाला नहीं।
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टाउनहाल का आर्य समाज भवन
सन् 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन से लेकर काकोरी केस की क्रांतिकारी गतिविधियों का केंद्र रहा। आर्य समाज का भवन आजादी के किसी स्मारक से कम नहीं है। क्रांतिकारी पं. देव नारायण भारतीय की प्रेरणा से आजादी के समर में कूदे पं. राम प्रसाद बिस्मिल और अशफाक ने आर्य समाज को अपनी कर्म स्थली बनाया, लेकिन सरकार ने आर्य समाज को आजादी का स्मारक बनाने पर कोई ध्यान नहीं दिया।
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शहीद अहमदउल्ला शाह पार्क
आजादी की लड़ाई में पहली आहुति देने वाले फैजाबाद के क्रांतिकारी अहमदउल्ला शाह उर्फ डंका शाह की स्मृति में लाल इमली चौराहा के पास खाली पड़े तिकोने भूखंड पर पालिका परिषद ने करीब दो दशक पहले यह पार्क विकसित किया और वहां शहीद की प्रतिमा भी लगाई गई। पार्क भले ही प्राचीन न हो, लेकिन देश की खातिर शहादत को सलाम करने का ठिकाना जरूर है। मौजूदा निजाम की अनदेखी से पार्क चौतरफा अतिक्रमण से घिरा रहता है।
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खिरनीबाग में शहीद बिस्मिल का आवास
जिले में लंबे समय तक क्रांतिकारी गतिविधियों को अंजाम देते रहे पं. राम प्रसाद बिस्मिल ने सालोें तक खिरनीबाग मोहल्ले में किराए के जिस घर को अपना आशियाना बनाया, वह गुमनामी में खोया है। बिस्मिल के अवदान पर शोध कर चुके कांट क्षेत्र के गांव त्रिलोकपुर निवासी डॉ. मदन लाल वर्मा ‘क्रांत’ और कांग्रेस केयुवा नेता अनूप वर्मा बिस्मिल के आवास को राष्ट्रीय स्मारक बनाने को प्रयत्नशील हैं। इस बावत पर्यटन मंत्रालय के पास प्रस्ताव विचाराधीन है।
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शहीद निजाम अली खां की मजार
शहबाजनगर में गांव से बाहर एक टीले पर शहीद निजाम अली खां की मजार है। 1857 की क्रांति के दौरान यहां केतत्कालीन शासक गुलाम कादिर अली खां ने निजाम अली को नायब नाजिम नियुक्त किया था। 22 अप्रैल 1858 को जनरल वाल पोल के नेतृत्व में ब्रिटिश सेना और क्रांतिकारियों के बीच अल्हागंज क्षेत्र में सिरसी गांव के पास हुए युद्घ में निजाम अली खां और दौलत राव बख्शी समेत सैकड़ों क्रांतिकारी शहीद हो गए। शहीद निजाम अली की मजार भी गुमनामी में खोई रहती है।
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शहीद अशफाकउल्ला खां की मजार
काकोरी केस में फांसी का फंदा चूमकर अमर हुए क्रांतिकारी अशफाकउल्ला खां को उनके पैतृक आवास केपास दफनाया गया। उनके वंशज ही शहीद की मजार की देखभाल करते हैं। साल में एक बार उनकी शहादत याद करने को मजार पर मेला लगता है, बाकी दिनों में वहां जाने और शहीद के एकांत को साझा करने की किसी को दिलचस्पी नहीं। रेलवे स्टेशन पर भी उनके अथवा अन्य साथी शहीदों की नाम पट्टिका नहीं होने से अन्य शहरों के लोग मजार तक पहुंचने को भटकते हैं।
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शहीद अहमदउल्ला शाह की मजार
15 जून 1858 को पुवायां में शहीद हुए अहमदउल्ला शाह का सिर काटकर शहर कोतवाली के पास लटकाया गया, लेकिन लोधीपुर के कुछ देशभक्त युवाओं ने शहीद के सिर को जबरदस्ती उतारकर खन्नौत नदी के किनारे दफना दिया। शहीद को ब्रिटिश लेखक होम्स ने अंग्रेजों का सबसे भयंकर शत्रु करार दिया था। इजिहासकारों को अहमदउल्ला शाह के प्रारंभिक जीवन के बारे में अधिक जानकारी नहीं है। सिर्फ इतना पता चलता है कि उनके पिता टीपू सुल्तान की सेना में अधिकारी थे और अंग्रेजों के खिलाफ युद्घ कौशल उन्हें पिता से विरासत में मिला था। यह मजार भी केवल शहादत की तारीख को गुलजार होती है।
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गरीबी से जंग लड़ रहे सेनानी ईश्वर नाथ के बेटे
0 इलाज के अभाव में चल बसीं सेनानी की पत्नी
अंग्रेजों से लोहा लेने वाले स्वतंत्रता संग्राम सेनानी ईश्वर नाथ मिश्र के परिवार के लोग गरीबी से जंग लड़ने को मजबूर हैं। पुवायां तहसील के गांव देवकली निवासी श्री मिश्र (ब्लेकी) नेता जी सुभाष चंद्र बोस के साथी थे। अंग्रेजों के खिलाफ बिगुल फूंकने के कारण उन्हें दो बार जेल जाना पड़ा। देश के आजाद होने के बाद उन्हें केंद्र और राज्य सरकार की ओर से पेंशन आदि का लाभ दिया गया।
उनके पुत्र राजीव और संजीव ने बताया: वर्ष 1998 में पिता ने साझे में ट्रैक्टर खरीदा था। वर्ष 2002 में पिता का निधन हो गया। ट्रैक्टर का कर्ज अदा नहीं हो पाने पर उनकी भूमि की नीलामी कर दी गई। जमीन चले जाने से वे भूमिहीन हो गए। पूरा परिवार मेहनत-मजदूरी के साथ पेंशन पर निर्भर हो गया। मार्च, 13 में उनकी माता मनोरमा देवी गंभीर रूप से बीमार पड़ गईं। एक साल से केंद्र सरकार और तीन माह से राज्य सरकार की ओर से दी जाने वाली पेंशन नहीं मिलने के कारण उनका समुचित इलाज नहीं हो पाया और उन्होंने दम तोड़ दिया। सेनानी आश्रित होने का कोई लाभ नहीं मिलने से वह मजदूरी कर तीन बच्चों की पढ़ाई और परिवार का पेट पाल रहे हैं। संजीव की पत्नी काफी समय से बीमार है, लेकिन गरीबी के चलते इलाज नहीं हो पा रहा।


बड़बोले नेताओं के मन में भरी है गंदगी
0 सेनानी श्याम बिहारी लाल का नजरिया
पुवायां। तहसील में एकमात्र जीवित स्वाधीनता सेनानी श्याम बिहारी लाल के मुताबिक स्वतंत्रता दिवस उनकी नजरों में सबसे बड़ा पर्व है, लेकिन आज के बड़बोले नेताओं के मन मेें भरी गंदगी ने इसके मायने बदल दिए हैं।
गांव बनिगवां निवासी वयोवृद्व सेनानी ने बताया: देश की आजादी की लड़ाई में हिस्सा लेने पर 22 साल की उम्र में पहली बार जेल भेजा गया। गांव में एक छपा हुआ फार्म आया था जिसमें लिखा था ‘अंग्रेजों भारत छोड़ो’। एक फार्म भरा तो कुछ ही दिन बाद गिरफ्तारी हो गई। देश को आजाद कराने के पीछे नेताओं की मंशा थी कि इससे गरीब जनता को अंग्रेजों और उनके एजेंट जमीदारों से मुक्ति मिलेगी। आजादी के बाद रुपये की कमी थी, सो भ्रष्टाचार भी कम था। अब नेता ही नहीं चाहते कि भय, भूख और भ्रष्टाचार से लोगों को निजात मिले और लोग जाति, संप्रदाय से ऊपर उठकर विकास के बारे में सोचें। ऊपर से सभी नेता बड़ी बातें करते हैं, लेकिन उनके मन में गंदगी भरी है।
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गांव तुलापुर में स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों की याद में बनाई गई टूटी पड़ी लाट
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स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों को पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की ओर से दिया गया ताम्रपत्र
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सेनानियों की याद में बना पार्क बदहाल
सन् 1940 के आसपास बंडा का देवकली और खुटार का तुलापुर गांव आजादी के दीवानों की गतिविधियों का खास केंद्र था। तुलापुर के बनवारी लाल शुक्ला, प्रेमशंकर शुक्ला, यदुनंदन प्रसाद शुक्ला, काशीप्रसाद शुक्ला, अयोध्या प्रसाद मिश्रा, जगदीश प्रसाद शुक्ला और चंद्रभाल को अंग्रेजों के खिलाफ जनजागरण करने पर जेल भेजा गया था। सेनानियों की याद में गांव के स्कूल में पार्क बनाकर वहां चबूतरे का निर्माण कर लाट लगवाई गई थी। लाट में स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल गांव के सभी पुरोधाओं के नाम अंकित थे। कालांतर में देखरेख के अभाव में पार्क और लाट टूट गए। अब इस स्थान पर केवल चबूतरा शेष है। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी प्रेमशंकर शुक्ला के पौत्र रिषि शुक्ला ने वर्ष 11 में लाट लगवाने के लिए तहसील दिवस में प्रर्थनापत्र दिया था तो जवाब में बीडीओ ने लिख दिया कि धन उपलब्ध नहीं है। उन्होंने पार्क बनावाने के लिए शासन तक कई बार पत्राचार किया, लेकिन कोई नतीजा नहीं निकला।
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अंग्रेजों के कानून कितने प्रासंगिक (एडवाइजरी)
आजादी मिलने के बाद अंग्रेज भले ही देश छोड़कर जा चुके हों, उनके बनाए कानून बदलते परिवेश में न केवल अप्रासंगिक हो गए हैं, बल्कि तमाम व्यवहारिक दिक्कतें पैदा कर रहे हैं। अगर ऐसे किसी कानून से आपके सम्मान, स्वाभिमान और हितों को पीड़ा पहुंची हो तो कृपया टेलीफोन नंबर 7897738255 पर दोपहर 12 से एक बजे केबीच हमें बताएं।
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