सद्गुरु कबीर का प्राकट्य उत्सव आज
ध्वजारोहण और बीजक पाठ से होगी कार्यक्रम की शुरूआत, दूर-दूर से अनुयायी पहुंचे कबीरचौरा
कबीर कोई किताब या दर्शन नहीं, बल्कि सुगंध बिखेरने वाला एक महकता हुआ फूल है : आचार्य रजनीश
संवाद न्यूज एजेंसी
मगहर(संतकबीरनगर)। सद्गुरु कबीर के 623 वें प्राकट्य उत्सव मनाने की तैयारियां बुधवार को पूरी कर ली गईं। देश के विभिन्न स्थानों से दिनभर उनके अनुयायी, कबीरपंथी कबीरचौरा पहुंचते रहे। उत्सव की शुरूआत बृहस्पतिवार (24 जून) सुबह सात बजे ध्वजारोहण और बीजक पाठ से होगी।
कबीर चौरा के महंत विचार दास ने बताया कि सुबह सात बजे से दस बजे तक ध्वजारोहण और बीजक पाठ होगा। 11 बजे दिन से दो बजे तक ‘हम रहनी के साथी’ विषय पर संगोष्ठी होगी। ढाई बजे से भंडारा, सांय छह बजे से प्रवचन चौका आरती और गुरु पूजा के कार्यक्रम आयोजित किए जाएंगे।
देश के विभिन्न स्थानों से पहुंचे अनुयायियों ने सद्गुरु कबीर को सभी के दिलों को खुशी देने वाला संत बताया। आचार्य रजनीश ने कहा है कि सद्गुरु कबीर जैसा अनूठा व अद्वितीय संत पूरे विश्व मे कहीं नहीं हुआ है। उनको किसी दायरे में बांधकर नहीं रख सकते। कबीर कोई किताब या दर्शन नहीं, बल्कि सुगंध बिखेरने वाला एक महकता हुआ फूल है अर्थात कबीर रूपी फूल अपनी सुगंध बिखेर रहा है। जिसका सीधे तौर पर अनुभव किया जा सकता है। सद्गुरु सभी लोगों के दिलों को खुशी देने वाले संत हैं। कबीर साहेब ने कभी कथनी करनी में अंतर नहीं किया है। उन्होंने कहा है कि उनका साथी वह नहीं जो कपड़े, रूप,पहनावे, वेष भूषा से पहचाना जाए, बल्कि वह उनका साथी हो सकता है जो कथनी और करनी दोनों पर खरा उतरे।
राजस्थान के जोधपुर से प्राकट्य उत्सव में शामिल होने के आईं साध्वी इंद्रा सहेब ने बताया कि वे पिछले 50 वर्षों से कबीर की अनुयायी हैं। दस वर्ष से अपने पति के साथ परिवार में बच्चों को छोड़कर पूरी तरह से कबीर के आश्रम में रहकर साध्वी बनकर सेवाभाव में जुटी हुई हैं। कबीर साहेब ने सभी को अपनी शरण में जगह दी है।
गांधीनगर दिल्ली से आए व्यवसायी कमल वर्मा ने बताया कि वह संतों के दर्शन के लिए देशाटन करते रहते है, लेकिन दस वर्ष पूर्व अपने गुरु राजेंद्र मास्टर के आग्रह पर कबीर की जन्म स्थली काशी गए तो वहां मुलाकात संत शिवदास से हुई। कबीर के बारे में इनके माध्यम से नजदीक से जानने का मौका मिला। तबसे वे कबीर के अनुयायी हो गए। इसका कारण बताते हैं कि कबीर साहेब के यहां बाहरी आडंबर, दिखावा नहीं है। यहां सिर्फ मानव भक्ति अर्थात मानवता दिखती है।