इन नेताओं का तर्क था कि पश्चिम बंगाल के चुनाव में भी किसानों से किसी एक दल को समर्थन देने की बात केवल इसीलिए नहीं कही गई थी, क्योंकि इससे किसानों को किसी एक दल के साथ जो़ड़ दिया जाता। इससे आंदोलन की साख प्रभावित हो सकती थी। इसी बात को ध्यान में रखकर इस बार भी राजनीतिक दल के गठन या किसी दल विशेष के लिए वोट करने की अपील न किए जाने का सुझाव दिया गया है। बैठक में एक किसान नेता गुरनाम सिंह चढ़ूनी की पूर्व में चुनाव में उतरने की घोषणा करने के बाद की परिस्थितियों पर भी विचार किया गया। ज्यादातर किसान नेताओं का कहना था कि उस घोषणा के बाद आंदोलन को लेकर अच्छी धारणा नहीं बनी थी। उस अनुभव को ध्यान में रखते हुए भी किसान नेताओं ने किसी नए राजनीतिक दल के गठन से दूर रहने का सुझाव दिया।
इन नेताओं का यह भी कहना था कि चुनाव में भारी धन खर्च होता है, और इसके लिए एक सुनियोजित-सुनियंत्रित संगठन की आवश्यकता होती है, जबकि किसानों के पास न तो इतना पैसा है, और न ही राजनीतिक संगठन के रूप में काम करने का कोई अनुभव। ऐसे में अगर चुनाव में उतरने की बात सोची जाती है तो इससे लाभ की बजाय नुकसान हो सकता है। हालांकि बैठक में सभी नेता इस बात पर अवश्य सहमत थे कि अगर वर्तमान रणनीति कारगर होती नहीं दिखती है तो बाद में इस पर कोई निर्णय लिया जा सकता है। फिलहाल, मुजफ्फरनगर से इस तरह की कोई घोषणा नहीं की जाएगी।
क्या करेंगे किसान
सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, रविवार की किसान महापंचायत से पूरे प्रदेश के किसानों से अपने 'दुश्मन' को पहचानने की अपील की जाएगी। पश्चिम बंगाल की तर्ज पर किसान नेता उत्तर प्रदेश के हर गांव, ब्लॉक, जिला स्तर पर एक-एक कमेटियों का गठन करेंगे। किसान नेता इन कमेटियों की अगुवाई में लगातार जनसभा करेंगे और किसानों को कृषि कानून के बारे में बताएंगे। किसान नेता किसानों को भाजपा के विरुद्ध मतदान करने की अपील तो करेंगे, लेकिन किसी एक दल के पक्ष में वोट करने की बात नहीं कहेंगे। किसानों से विधानसभा क्षेत्रवार जो भी भाजपा उम्मीदवार को हराने की काबिलियत रखता हो, उस उम्मीदवार के लिए वोट करने की अपील की जाएगी।
भाजपा ने कहा, बेकार साबित होगी कवायद
भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता प्रेम शुक्ला ने अमर उजाला से कहा कि किसान नेता आज तक यह नहीं बता पाए हैं कि इन कृषि कानूनों में गलत क्या है? वे आज तक यह नहीं बता पाए हैं कि इन कृषि कानूनों से किसानों की जमीन उद्योगपतियों के पास चले जाने की बात कहां लिखी गई है। यह केवल प्रोपेगेंडा है जो सफल नहीं हो पाया है। यही कारण है कि इन किसान नेताओं को पंजाब, हरियाणा के अलावा पूरे प्रदेश के किसानों से कहीं भी समर्थन नहीं मिला।
प्रेम शुक्ला ने कहा कि पश्चिम बंगाल में भी भाजपा दो सीट से 77 सीटों तक पहुंची है। यह किसी भी राजनीतिक दल के लिए बड़ी उपलब्धि है, इसे किसी तरह कमतर करके नहीं आंका जा सकता। उलटे, जिन राजनीतिक दलों कांग्रेस और वामपंथी दलों ने किसानों का समर्थन किया था, वे शून्य पर पहुंच गए। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार ने किसानों के लिए भारी काम किया है और यहां किसानों के नाम पर कोई प्रोपेगेंडा सफल नहीं होगा।