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जो यह वक्त मेरे हक में कभी साजगार होता, तो कभी न रंजो गम का मेरे दिल पे वार होता

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संभल। नखासा में अल्लामा इकबाल फाउंडेशन की ओर से मुशायरे का आयोजन किया गया। जिसमें शायरों ने कलाम पेश कर वाहवाही लूटी। नगर के हुसैनी रोड स्थित फारूख जमाल एडवोकेट के आवास पर आयोजित कार्यक्रम में उर्दू के कवि मिर्जा गालिब की जयंती पर उनको याद किया गया।
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जिसका शीर्षक एक शाम गालिब के नाम रहा था। हिंद इंटर कॉलेज के पूर्व प्रधानाचार्य शेख वकार रूमानी मुख्य अतिथि के रूप में रहे। विशिष्ट अतिथि मुशीर खां तरीन व जेडीयू इंटर कालेज के प्रधानाचार्य शाहिद हुसैन रहे। अल्लामा इकबाल फाउंडेशन के अध्यक्ष डॉ. आबिद हुसैन हैदरी ने तरही मुशायरे की रिवायत पर चर्चा करते हुए इसे नई पीढ़ी से जोड़ने की जरूरत पर बल दिया।
शफीक बरकाती ने कहा कि यह भी क्या तरजे तगाफुल है कि मरने वाले राह तकते रहे पत्थर का जिगर होने तक। अजीम सरवर ने कहा कि मेरे इश्क को दुआ दे है जहां में नाम वरना, न मेरा शुमार होता न तेरा शुमार होता। हकीम बुरहान संभली ने कहा कि एक मुद्दत से ए बुरहान दरे जाना पर हम भी बैठे हैं इनायत की नजर होने तक।
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पैकर संभली ने कहा कि दोस्ती होना कोई खेल तमाशा तो नहीं, आग से खेले हैं हम शमशो कमर होने तक। शाह आलम रोनक ने कहा कि जो यह वक्त मेरे हक में कभी साजगार होता तो कभी न रंजो गम का मेरे दिल पे वार होता। तनवीर हुसैन अशरफी ने कहा कि वक्त है अब भी पलट आओ जनाबे तनवीर, लूट लेवे न अजल जादे सफर होने तक। डा. मुनव्वर ताबिश ने कहा कि खौफ के साए तआकुब में रहा करते हैं, किसी सुनसान हवेली से गुजर होने तक। शेख वकार रूमानी ने कहा कि सदफ चश्म पे क्या गुजरी कोई क्या जाने, कतर ए अश्क के खुश आब गुहर होने तक।
सुल्तान मोहम्मद खान कलीम ने कहा कि जिन परिंदों की कफस ही में खुली थी आंखें, हर कफस ही को समझते रहे पर होने तक। बुलंद अख्तर कामिल ने कहा कि मैं भी जिंदा से करूंगा अब रिहाई हासिल, सर का कुछ हश्र हो दीवार में दर होने तक। अध्यक्षता कवि डा. नसीमुज्ज्फर व संचालन शफीक बरकाती ने की। इस दौरान अजीम सरवर, रिजवान मसरूर, गुलशन रजा, शाह फैसल, शाहिद हुसैन, ताहिर सलामी, डा. रय्यान युसुफ, शोएब अब्बासी, कामिल अहमद, इबादुर्रहमान पप्पू, मोहम्मद जुबैर, आशिकीन, सुल्तान पाशा, वाजिद अली शाह, कमर आलम, अदनान अहमद, मुजीब अहमद, अब्बास, अबान आदि मौजूद रहे।
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