संभल। सावन माह की शुरुआत रविवार को होगी। इस दिन दोपहर बाद तीन बजकर 27 मिनट तक आयुष्यमान योग है। ज्योतिषाचार्यों के मुताबिक यह योग रोगों से छुटकारा दिलाने के साथ ही भक्तों को लंबी आयु प्रदान कराएगा। सावन मास का समापन 22 अगस्त को धनिष्ठा नक्षत्र में होगा। इसी दिन रक्षाबंधन का पर्व भी मनाया जाएगा।
ज्योतिषाचार्य आचार्य शोभित शास्त्री बताते हैं कि इस बार सावन की शुरुआत आयुष्मान योग में हो रही है और सावन के चारों सोमवार को बहुत ही मंगलकारी संयोग बन रहे हैं। आषाढ़ माह के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा के बाद सावन शुरू होता है। आषाढ़ माह की शुक्ल एकादशी के दिन देव सो जाते हैं। देवशयनी एकादशी से ही चतुर्मास का प्रारंभ हो जाता है। सावन माह से व्रत और साधना के चार माह अर्थात चातुर्मास प्रारंभ होते हैं। यह चार माह हैं- सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक। पौराणिक कथा के अनुसार देवी सती ने अपने दूसरे जन्म में शिव को प्राप्त करने के लिए युवावस्था में सावन महीने में निराहार रहकर कठोर व्रत किया और उन्हें प्रसन्न कर विवाह किया था। इसलिए यह माह विशेष है।
शिवालयों में सावन मास की तैयारियां शुरू
जिले के सभी नाथ मंदिरों में सावन मास की तैयारियां शुरू हो गईं हैं। कोविड प्रोटोकाल के तहत इस बार भी जलाभिषेक कराया जाएगा। संभल तहसील क्षेत्र के गांव गुमसानी स्थित झारखंडी महादेव मंदिर, फत्तेहपुर भाऊ स्थित प्रकटेश्वर महादेव मंदिर, बेरनी शिव मंदिर में तैयारियां शुरू हो गईं हैं। इन मंदिरों में दूर-दूर से जलाभिषेक करने के लिए आते हैं।
इस बार सावन में होंगे चार सोमवार
- 26 जुलाई (पहला सोमवार) घनिष्ठा नक्षत्र, सौभाग्य योग।
- 2 अगस्त (दूसरा सोमवार) नवमी तिथि, कृतिका नक्षत्र व सर्वार्थ सिद्धि योग।
- 9 अगस्त (तीसरा सोमवार) श्लेषा नक्षत्र, वरियान योग, शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा।
-16 अगस्त (चौथा सोमवार) अनुराधा नक्षत्र, ब्रह्म योग, यायीजय योग व सर्वार्थ सिद्घि योग।
गंगाजल भरकर लाने की यह है परंपरा
संभल। ज्योतिषाचार्य ने बताया कि सावन को भगवान शिव का महीना कहा गया है। शास्त्रों के अनुसार प्राचीन काल में देवों ने असुर नाविकों, योद्धाओं, श्रमिकों की सहायता से समुद्र-मंथन का संयुक्त अभियान सावन के महीने में ही आरंभ किया था। इस मंथन से जो चौदह रत्न-लक्ष्मी, कामधेनु , उच्चै:श्रवा, चंद्रमा, कौस्तुभ, कल्पवृक्ष, वारुणी, पारिजात, धन्वन्तरि, अमृत, ऐरावत, हलाहल आदि मिले थे। इनके बंटवारे में देवों और असुरों के बीच जम कर विवाद हुआ था। देवों ने बारह कीमती रत्न खुद के लिए रख लिए। बेचारे असुरों के हाथ सिर्फ वारुणी लगी। चौदहवां विनाशकारी रत्न हलाहल सामने आया तो सृष्टि पर विनाश का खतरा उत्पन्न हो गया। इस विष का कोई दावेदार नहीं मिला। सृष्टि को इस विष के घातक प्रभाव से बचाने के लिए देवों और असुरों में समान रूप से प्रिय शिव ने यह जहर खुद लेना स्वीकार किया। यह जहर उनके कंठ में एकत्र हो गया, जिसके कारण उन्हें नीलकंठ का नाम मिला। उनके शरीर में विष का ताप कम करने के लिए देवों ने दूर-दूर से गंगाजल लाकर उनका अभिषेक किया था। तब से शिवभक्तों द्वारा सावन के महीने में पवित्र गंगा से जल लेकर भारत के विभिन्न ज्योतिर्लिंगों और शिव मंदिरों में अर्पित करने की परंपरा चली आ रही है।