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नौकरी के साथ घर भी संभाल रहीं महिलाएं

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बसों में काट रहीं टिकट... और चला रहीं ट्रेनें
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- नारी सशक्तिकरण की प्रेरणा हैं ऐसी महिलाएं
- कई महिलाएं मृतक आश्रित में बनी है परिचालक
सहारनपुर। पति की मृत्यु हो गई थी, बच्चे छोटे थे और परिवार की जिम्मेदारी का भार कंधों पर आ गया था। जीवन के पथ पर आगे पढ़ने को कदम डगमगा रहे थे, मगर साहस ने साथ नहीं छोड़ा। थोड़ा सोच विचार कर निश्चय किया और बन गईं परिचालक। यह उन महिलाओं की कहानी है जो मृतक आश्रितों में उत्तर प्रदेश सड़क राज्य परिवहन निगम में परिचालक के रूप में नौकरी कर रही हैं। एक तरफ वह परिवार की जिम्मेदारी संभाल रही हैं तो परिचालक की ड्यूटी भी बखूबी निभा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस पर पेश है रिपोर्ट...
-- शुरू में हुई थी मुश्किल, अब बन हो गई आदत
मुजफ्फरनगर के साकेत कॉलोनी निवासी सीमा रानी के पति प्रदीप कुमार का 2014 में निधन हो गया था। मृतक आश्रित में करीब तीन साल पूर्व परिचालक के रूप में नौकरी मिली। अब वह बच्चों सहित सहारनपुर के लक्ष्मीनगर में रहती हैं। रोजाना सुबह ड्यूटी पर जाती हैं। हरिद्वार रूट पर इन दिनों ड्यूटी है। सीमा कहती हैं कि शुरूआत में दिक्कत हुई थी, क्योंकि घर संभालना और नौकरी करना संभव नहीं हो पा रहा था, लेकिन अब आदत हो गई है। ऐसा नहीं लगता कि परिचालक की नौकरी महिलाएं नहीं कर सकती हैं।
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-- एक महीने के तनाव के बाद सब आसान हो गया
जनकनगर निवासी कुसुम नेगी के पति गजेंद्र सिंह नेगी का 2016 में निधन हो गया था। नवंबर 2018 में कुसुम ने परिचालक के रूप में नौकरी शुरू की। वह बतातीं है कि सुबह साढ़े छह बजे रोडवेज वर्कशाप पहुंचती हैं। देहरादून रूट पर बस में ड्यूटी है। शुरू के एक महीने तक तनाव था, क्योंकि प्रतिदिन 280 किलोमीटर का सफर होता है, लेकिन फिर स्थिति सामान्य हो गई।
-- संघर्ष ही जीवन है, यही सबक मिला
सहारनपुर के लेबर कॉलोनी निवासी सीमा शर्मा ने पति का निधन होने पर दो साल पहले परिचालक के रूप में नौकरी करनी शुरू की। बड़ा बेटा एक कंपनी में नौकरी करता है, जबकि बेटी 12 वीं की पढ़ाई कर रही है, दूसरा बेटा शुक्रताल स्थित संस्कृत विद्यालय से पढ़ाई कर रहा है। सीमा शर्मा कहती हैं कि संघर्ष कर रही हूं, और जीवन इसी का नाम है, इसमें किसी तरह की हिचक नहीं है।
-- पिता की जगह परिचालक बनी शिखा
बेरीबाग निवासी शिखा के पिता राजकुमार का निधन 2015 में हुआ था। तीन साल बाद 2018 में शिखा ने मृतक आश्रित में परिचालक की नौकरी संभाली। परिवार में मां विद्या देवी और छोटा भाई है। शिखा कहती हैं कि रोजाना जगाधरी रूट पर बस के तीन फेरे लगते हैं और करीब 240 किलोमीटर बस में सफर होता है। मां साहस बढ़ाती है और छोटे भाई की जिम्मेदारी का अहसास होता है, जिस कारण नौकरी करने में कोई कठिनाई नहीं हो रही है।
------ परिवार बढ़ाता है हौसला
- रेलवे में सहायक लोको पायलट की जिम्मेदारी निभा रहीं शालिनी सरसावा क्षेत्र के गांव इस्माइलपुर की रहने वाली हैं। वह कहती हैं कि आईटीआई, सीटीआई और स्नातक की पढ़ाई कर अपनी मर्जी से रेलवे में पायलट की नौकरी शुरू की, जब ट्रेन का संचालन करती हैं तो खुद पर गर्व होता है। परिवार के लोग भी हौसला बढ़ाते हैं।
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- रुड़की की रहने वाली छवि केंथ भी रेलवे में सहायक लोको पायलट हैं। सितंबर 2019 से नौकरी कर रही हैं। पिता प्राइवेट स्कूल में अध्यापक हैं। छवि का कहना है कि महिलाएं आज हर क्षेत्र में आगे बढ़ रही हैं, जब महिलाएं एयरक्राफ्ट चला सकती हैं तो ट्रेन चलाना भी मुश्किल नहीं है।
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