सहारनपुर में मोहर्रम की 10 तारीख यौमे अशुरा को इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम एवं करबला के शहीदों की याद में मातमी जुलूस निकाला गया। इस दौरान सोगवार फूट-फूट कर रोए। अकीदतमंदों ने जंजीरों में बंधी छुरियों से अपने शरीर को लहूलुहान किया।
जुलूस में या हुसैन, या हुसैन, या अब्बास, या अब्बास की सदाएं बुलंद हो रही थी। कमाह का मातम बड़ी इमाम बारगाह से होता हुआ जामा मस्जिद तक हुआ, जामा मस्जिद कला चौक फव्वारा पर हुज्जतुल इस्लाम मौलाना शेख इब्राहिम कुम्मी ने तकरीरें करते हुए हजरत इमाम हुसैन अलैहिस्सलाम की
कुर्बानी का मंजर पेश किया। उसके बाद जुलूस आगे बढ़ा और जंजीरों का मातम करबला पहुंचने तक हुआ। बड़ी इमाम बारगाह जाफर नवाज से शुरू हुए जुलूस में सबसे आगे ऊंट, घोड़े, झोटा बुग्गी पर बैठे छोटे-छोटे बच्चे काले कपड़े पहले हाथों में काले निशान लिए हुए हुसैनियत जिंदाबाद, यजिदयत
मुर्दाबाद, नाराए तकबीर अल्लाहो अकबर की सदाएं बुलंद करते चल रहे थे। शबीह अलम हजरत अब्बास अलैहिस्सलाम जुलूस निकाला। अंजुमने इमामिया में नौहा पढ़ने वालों में मिर्जा अयाज, मिर्जा मेहरबान, ख्वाजा आसिफ रजा, शहबाज काजमी, शुजा काजमी, मिर्जा नईम, मिर्जा मुम्ताज, अली मेहदी, शौजब रजा शामिल रहे।
अंजुमने अकबरिया में नोहा पढ़ने वालों में सलीस हैदर काजमी, अनवर अब्बास जैदी, रहबर जैदी, सन्नी आब्दी, मानू आब्दी, अदनान, गयाज जैदी, शबीह हैदर शामिल रहे। अंजुमने अकबरिया के साथ फूलों से सजा जुलजुनाह चल रहा था, जिसकी लगाम जावेद हैदर, तनवीर हैदर, हुसैन अब्बास एवं अकबर अब्बास ने पकड़ रखी थी।
जुलूस के बीच में ताजिये चल रहे थे। जुलूस बड़ी इमाम बारगाह से शुरू होकर पुराना घास कांटा स्थित करबला पर पहुंचकर संपन्न हुआ। सोगवारों ने करबला पहुंचकर फाका खोला।
जुलूस का संचालन जावेद हैदर जैदी ने किया। जुलूस में नियाज हैदर जैदी, इंतजार मेहदी, मंजर हुसैन काजमी, काजी अकरम, प्यारे मियां, सकलैन रजा, सलामत हुसैन, फरहत मेंहदी, साजिद काजमी, जैगम अब्बास, जिया अब्बास, रियाज हैदर, शबाब हैदर, मिर्जा अहसान, सफदर अली शामिल रहे।
करबला के शहीदों की याद में मुहर्रम की 9 तारीख को रात भर शब्बेदारी की गई। अमाले शबे आशुरा अदा की गई तथा इमाम बारगाहों में रोशनी, एवं धूप, अगरबत्ती की गई। देर रात में अंगारों पर नंगे पांव चलकर मातम किया गया एवं ताजिये सजाए गए।
सुबह अलविदा नमाज पढ़ी गई। मुहर्रम के जुलूस में इंतजामिया स्काउट्स आतंकवाद के खिलाफ स्लोगन लिखी तख्तियां लेकर चल रहे थे। मंजर हुसैन काजमी ने बताया कि एलआईयू ने जुलूस में इसे नई परंपरा बताते हुए उसे रोक दिया, जिससे लोगों में आक्रोश पैदा हो गया। समझाने पर लोग शांत हुए और जुलूस निकला।