बारिश का सीजन चल रहा है। मां शाकुंभरी सिद्धपीठ नदी में पहाड़ों से कब बाढ़ का पानी आ जाए, कोई नहीं जानता। श्रद्धालु और स्थानीय लोग सिर्फ इतना जानते हैं कि सिद्धपीठ से आगे रक्तदंतिका मंदिर से पानी को लेकर अलर्ट आता है। अलर्ट कौन करता है, क्या इसकी प्रक्रिया है, यह जानने के लिए रविवार को अमर उजाला ने इसकी पड़ताल की। इस दौरान ऐसे भी व्यक्ति मिले, जो एक किमी दूर से पानी की आवाज पहचान लेते हैं। लगातार पानी चलने के कारण रोटी की जगह पत्ते खाकर दिन बिताते हैं।
पांच दिन पहले पहाड़ों से पानी आने के बाद भूरा देव मंदिर पर ही वाहनों को रोका जा रहा था। नदी में बह रही पानी की धारा और ऊबड़-खाबड़ पत्थरों के बीच से पैदल होते हुए अमर उजाला टीम दो किमी दूर रक्तदंतिका मंदिर पर पहुंची। दोनों तरफ पहाड़ और सामने से पानी कब आ जाए, कुछ पता नहीं। यहां पहुंचने के बाद पता चला कि पानी के अलर्ट को लेकर जो पुलिसकर्मी तैनात किए गए हैं, वे रक्तदंतिका मंदिर के सामने की तरफ धुना प्राचीन गोरखनाथ जाहरवीर मंदिर के बाहर बैठते हैं। वहीं पर सायरन लगा हुआ है। इसके बाद टीम गोरखनाथ जाहरवीर मंदिर पर पहुंची।
पानी में घोलकर पीते हैं धुने की राख, पत्ते खाकर भरते हैं पेट
वहां पहुंचने पर नाथ संप्रदाय से जुड़े बाबा मिट्ठूनाथ मिले। उन्होंने बताया कि वह काफी साल से यहां रह रहे हैं। बरसात के तीन महीने बेहद कठिनाई वाले होते हैं। दिक्कत तब और अधिक होती है, जब कई-कई दिनों तक पानी चलता रहता है। ऐसे में बाहरी दुनिया से रास्ता कट जाता है। कई बार खाद्य सामग्री खत्म होने के बाद धुने की राख को पानी में घोलकर पीना पड़ता है या फिर पेड़ के पत्तों से पेट भरते हैं। अब इतना आभास हो चुका है कि पानी की आवाज एक किमी दूर से पहचान लेते हैं।
एक तरफ पानी, दूसरी तरफ जानवरों का खतरा
गोरखनाथ जाहरवीर मंदिर के बाहर ड्यूटी पर तैनात यूपी पुलिस के होमगार्ड अमित कुमार मिले। अमित ने बताया कि रात में भी पैनी नजर रखनी पड़ती है। एक तरफ पानी आने का डर तो दूसरी तरफ जंगली जानवरों का खतरा रहता है। पानी का पता चलते ही सबसे पहले सिद्धपीठ की चौकी पर फोन करते हैं। यदि मोबाइल में नेटवर्क नहीं है तो जाहरवीर मंदिर पर लगे सायरन को बजा देते हैं। जिसकी आवाज से सिद्धपीठ पर स्थानीय लोग और श्रद्धालु अलर्ट हो जाते हैं। इसके बाद श्रद्धालुओं को वहां से निकाल लिया जाता है।