सहारनपुर। पूरे देश में सबसे अधिक पसंद किया जाना वाला पेय पदार्थ चाय को माना जाता है। चाय का इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं है। भारत में चाय की खेती की जड़ें सहारनपुर से जुड़ी हैं। यहां के मुगलकालीन कंपनी गार्डन में चाय की पौध तैयार हुई थी। चाय बगानों में कार्य करने वाले और उद्योग को बढ़ावा देने के लिए हर वर्ष 21 मई को अंतरराष्ट्रीय चाय दिवस मनाया जाता है।
सहारनपुर में चाय की खेती का पहला विवरण ब्रिटिश लेखक बिशप हेबर की 1824 की कुमाऊं यात्रा के संदर्भ में मिलता है। सहारनपुर में चाय की खेती की संभावना को देखते हुए तत्कालीन उद्यान अधीक्षक डॉ. रोयले ने अपनी रिपोर्ट ईस्ट इंडिया कंपनी को भेजी थी। इसके बाद गर्वनर लॉर्ड विलियम बेंटिक ने उद्यान का दौरा किया था। उनके दौरे के बाद 1835 में दो हजार पौधों की खेप उद्यान में पहुंची थी। इस बात का जिक्र 1908 में लिखे गए सहारनपुर के गजेटियर में भी है। 1824 में उद्यान के अधीक्षक रहे डॉ. रोयले के बाद डॉ. फाकनर को उद्यान का अधीक्षक बनाया गया। उन्होंने यहां पर चाय के पौधे लगाए। कुछ पौधों को शिवालिक की पहाड़ियों की तलहटी में लगाया गया, जो सहारनपुर और देहरादून क्षेत्रों में पड़ता है। पौधों को तैयार कर उन्हें देश के अलग-अलग हिस्सों में भेजा गया।
- मुगलकालीन है उद्यान
जब सहारनपुर मुगल शासन के अधीन था, तब यहां पर एक उद्यान की स्थापना की गई थी। दिल्ली पर अंग्रेजों का कब्जा हुआ तो उद्यान को कंपनी गार्डन का नाम दिया गया। अंग्रेजी शासन काल के दौरान उद्यान में औषधीय पौधों के साथ अन्य पौधों पर अनुसंधान किया गया। इनमें सिनकोना, चाय, कॉफी, अलसी, महोगनी यूकेलिप्टस, अकोल तथा टेपियोका आदि शामिल है।