सहारनपुर में ऐतिहासिक दृष्टि से सरसावा का सिंधुकालीन टीला सहारनपुर ही नहीं, बल्कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की महत्वपूर्ण साइट है। इसके अब संरक्षित होने की उम्मीद जगी है।
टीले का निरीक्षण करने पहुंची राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ की टीम ने रिपोर्ट तैयार की है। टीम के सदस्यों ने टीले को कब्जों से मुक्त कराने के बाद इसकी बाउंड्री वाल कराने की बात कही है।
ऐतिहासिक स्थलों को बचाने की दिशा में काम कर रहे सरसावा के गांव सौराना निवासी शोधार्थी एवं लेखक राजीव उपाध्याय 'यायावर' ने बताया कि करीब दो दशक पहले वाराणसी आर्कोलॉजिकल यूनिट के रीजनल अधिकारी डॉ. सुभाष चंद्र यादव की देखरेख में टीले की फेंसिंग कराकर गेट लगाया गया था।
इसके बाद राज्य पुरातत्व विभाग ने टीले को संरक्षित घोषित किया था। मगर आज न तो गेट है और न ही फेसिंग है। तीन ओर से टीले पर अतिक्रमण हो रहा है। टीले से सटे कुछ किसानों ने टीले की जमीन को काटने के बाद समतल कर अपनी खेतों में मिला लिया है।
इससे आहत राजीव उपाध्याय की ओर से वर्ष 2013 में राज्य पुरातत्व विभाग के निदेशक को पत्र लिखकर टीले पर हो रहे कब्जों की जानकारी दी थी। सप्ताहभर पहले ही राज्य पुरातत्व विभाग लखनऊ की टीम ने टीले का निरीक्षण कर हकीकत जानी।
टीम में सहायक पुरातत्व अधिकारी राजीव कुमार त्रिवेदी और संरक्षक सहायक प्रदीप सिंह शामिल रहे। उन्होंने जल्द ही टीले की बाउंड्री वाल कराने तथा गेट लगाने की बात कही।
टीले के बारे में यह भी
q सरसावा के टीले को कोट के नाम से जाना जाता है। कोट संस्कृत भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ किला होता है। इससे स्पष्ट होता है कि आज जहां सरसावा का टीला है, वहां कभी किला हुआ करता था।
q सरसावा के टीले से धूसर चित्रित मृदभांड के टुकड़े मिलते रहे हैं। इनका प्रयोग आज से करीब 3500 वर्ष पहले किया जाता था। इसके अलावा टीले से कई संस्कृतियों के अवशेष प्राप्त होते रहे हैं।
q टीले के ऊपरी हिस्से पर विशाल दीवारों को स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है। टीले की विशालता क्रिकेट के मैदान जितनी है।
q टीले से प्राप्त सभी अवशेषों का अध्ययन कर पाया गया है कि 3500 वर्ष पुराने मृदभांड के बर्तन सिंधुकाल से संदर्भित हैं। यह साइट सिंधुकाल की सभ्यता के समकालीन है।
q पुरातत्वविदों का मानना है कि जब भी सरसावा के टीले का उत्खनन होगा तो उसमें से अनेक महत्वपूर्ण तत्य सामने आएंगे।