देवबंद। त्रिस्तरीय पंचायत चुनाव में चुनाव चिह्न आवंटित होते ही प्रचार तेज हो गया है। प्रत्याशी जहां मतदाताओं को विभिन्न तरह के प्रलोभन देकर अपना वोट बैंक जुटाने में लगे हैं वहीं मतदाताओं की पीड़ा है कि प्रधान बनने के बाद उनके सुर बदल जाते हैं। गांवों में जहां रास्ते खस्ताहाल हैं वहीं स्वच्छ पेयजल भी मयस्सर नहीं है। जल निकासी और पथ प्रकाश व्यवस्था भी बेहतर नहीं है। ग्रामीणों का कहना है कि यदि ईमानदारी से पंचायत निधि का इस्तेमाल हो तो गांवों की दशा सुधर जाएगी।
-- गांव में घुसने वाले सभी रास्ते वर्षों से क्षतिग्रस्त
देवबंद से करीब 11 किमी की दूरी पर 1800 की आबादी के गांव तलहेड़ी बुजुर्ग को आने वाले लगभग सभी रास्ते क्षतिग्रस्त हैं। यूं तो गांव में स्वच्छ पेयजल के लिए पानी की टंकी लगी है, लेकिन गांव के अंतिम छोर तक उसका पानी नहीं पहुंचता है। लोग हैंडपंपों का खारा पानी पीने को मजबूर हैं। ग्रामीण मोहम्मद याकूब त्यागी, सरफराज त्यागी, यासीन, मुरसलीन, लिफाकत और मुर्तजा त्यागी बताते हैं कि जब भी कोई नया प्रधान बनता है तो वह गांव में बिजली के खंभों पर लाइटें तो लगवा देता है, लेकिन कुछ दिन बाद खराब होने पर उन्हें ठीक करने की जहमत तक नहीं उठाई जाती। ऐसे में बची योजना का वक्त अंधेरे में ही कटता है।
-- हुलासगढ़ में तीन योजनाओं में भी नहीं बन सकी सड़कें
देवबंद तहसील के अनुसूचित जाति बाहुल्य गांव हुलासगढ़ का भी बुरा हाल है। धर्मपुर, भवनपुर व हुलासगढ़ को मिलाकर बनी इस पंचायत में गांव में घुसने वाले करीब एक किमी मार्ग पर कहने को तो खड़ंजा बिछा हुआ है, लेकिन वह खस्ताहालत में है। यहां के ग्रामीण मुनेश कुमार, दीपक कुमार, नीरज और विकास ने बताया कि 800 की आबादी वाले हुलासगढ़ गांव से ही 20 साल में तीन लोग प्रधान बन चुके हैं, लेकिन टूटी सड़कों की तरफ कोई ध्यान नहीं देता है। गांव में पानी की टंकी नहीं है। जिसकी लंबे समय से मांग चली आ रही है। टंकी के अभाव में स्वच्छ पेयजल का टोटा है।
-- रास्तम के विकास पर ध्यान नहीं देते प्रधान
1200 की आबादी वाली रास्तम ग्राम पंचायत से सुल्तानपुर गांव भी जुड़ा है। पिछले 20 साल के दरम्यान सिर्फ एक बार ही गांव का व्यक्ति प्रधान बना। अधिकांश सुल्तानपुर गांव से प्रधान बनते आए हैं। ग्रामीण सुरेश शर्मा, बिजेंद्र शर्मा, अमित, कपिल और चीकू ने बताया कि सुल्तानपुर गांव से ही प्रधान बनने के कारण उनके गांव के विकास पर ध्यान नहीं दिया जाता। अधिकांश योजनाओं का लाभ सुल्तानपुर में चला जाता है। गांव में बरातघर नहीं है। नालियों की भी सफाई भी नियमित रूप से नहीं होती है। ग्रामीणों को खुद ही नालियों की सफाई करनी पड़ती र्है।