रोजा इंसाफ, इंसानियत, हमदर्दी का देता है सबक
सहारनपुर। जमीयत दावतुल मुसलीमीन के संरक्षक मौलाना कारी इस्हाक गोरा ने हेल्पलाइन के जरिए रोजेदारों के सवालों के जवाब दिए। उन्होंने कहा कि रोजा खुदा की इबादत है, जो रूहानी और जिस्मानी एतबार से इंसान के लिए फायदेमंद है। रोजा अच्छे व्यवहार, इंसाफ, इंसानियत, हमदर्दी का सबक देता है।
सवाल- तीतरो निवासी उस्मान ने पूछा कि मेरा दोस्त रोजा होते हुए भी फिल्मे देखता है और गाने भी सुनता है। इतना ही नहीं, लोगों से झगड़ा भी करता है। शरीयत में ऐसे लोगों के लिए क्या कहा गया है।
जवाब- शरीयत के मुताबिक गाने सुनना, फिल्में देखना और झगड़ा करना बड़ा गुनाह है। खासकर रोजे की हालत में हर तरह के गुनाहों से बचना चाहिए। गुनाहों के बावजूद रोजा तो हो जाएगा, लेकिन यह अल्लाह के यहां कुबूल होगा या नहीं, यह देखने वाली बात होगी। हदीस में पैगंबर मोहम्मद साहब ने फरमाया जिस व्यक्ति ने रोजे की हालत में बेहूदा कलाम या बेहूदा काम न छोड़ा तो उसके भूखे प्यासे रहने का कोई फायदा नहीं है।
सवाल- मुरादाबाद निवासी मसूद अख्तर ने पूछा कि रात में तरावीह नहीं पढ़ी है। क्या शरीयत के अनुसार वह अब सुबह में उसकी कजा अदा कर सकते हैं।
जवाब-शरीयत के मुताबिक अगर किसी व्यक्ति ने तरावीह नहीं पढ़ी और सुबह हो गई तो अब उसकी कजा नहीं है।