सीता स्वयंवर के बाद भगवान श्रीराम की बरात निकालकर वर-वधु पक्ष की मिलनी करने के साथ ही विवाह की सभी रस्में पूरी की जाती हैं। लीला के शुभारंभ से पूर्व गंगा स्नान कर सभी पात्र संकल्प लेते हैं और गंगा स्नान कर ही स्वरूप का त्याग करते हैं। मंचन वाले दिनों में सभी पात्र सात्विक ढंग से जीवन व्यतीत करते हैं और जमीन पर सोते हैं।
क्लब के मीडिया प्रभारी अमित यादव उर्फ मोनू ने बताया कि दशहरा के आयोजन में भी हिंदू धर्म की वैदिक संस्कृति का एक अनूठा मिश्रण देखने को मिलता है, जिसमें रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतले दहन के बाद अग्नि को दूूध की छींटे मारकर शांति किया जाता और अस्थियों का हिंदू रीति रिवाज से गंगा में विसर्जित की जाएंगी।
इसके अलावा दर्शकों को रोमांचित करने के लिए मंच पर विशेष लाइटिंग और साउंड सिस्टम की व्यवस्था की गई है। इसमें मेघनाथ, कुंभकरण, अहिरावण वध की लीला का मंचन के लिए भी विशेष तैयारियां की गई हैं।