देवबंद(सहारनपुर)। जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं दारुल उलूम के सदर मुदर्रिस मौलाना अरशद मदनी ने संसद से पारित राष्ट्रीय गौरव अपमान निवारण (संशोधन) विधेयक-2026 को संविधान और धार्मिक स्वतंत्रता के विरुद्ध बताते हुए इसकी कड़ी आलोचना की है। उन्होंने कहा कि किसी भी नागरिक को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विपरीत किसी गीत या विचार को अपनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
मौलाना अरशद मदनी ने शनिवार को जारी बयान में कहा कि संशोधित कानून के तहत राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम को राष्ट्रगान जन-गण-मन के समान वैधानिक संरक्षण दिया गया है और इसके अपमान को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम के कुछ अंश मातृभूमि को देवी स्वरूप मानकर उसकी वंदना और उपासना का भाव व्यक्त करते हैं। इस्लाम में इबादत केवल एक अल्लाह की, की जाती है। ऐसे में गीत के कुछ हिस्से मुस्लिम आस्था और ईमान के अनुरूप नहीं हैं।
मौलाना मदनी ने कहा कि भारतीय संविधान का अनुच्छेद-25 प्रत्येक नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता और अनुच्छेद-19 अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार देता है। इसलिए किसी व्यक्ति को उसकी धार्मिक मान्यताओं के विरुद्ध किसी नारे, गीत या विचार को स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। उन्होंने आरोप लगाया कि यह विधेयक चुनावी राजनीति और सांप्रदायिक एजेंडे को आगे बढ़ाने के साथ-साथ जनता का ध्यान वास्तविक मुद्दों से भटकाने का प्रयास है। मौलाना मदनी ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों की रक्षा सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।