पिछले एशियाड में नहीं हो सका था चयन, था मलाल
प्राची का कहना है कि वह वर्ष 2014 से खेल रही है। चार साल पहले हुए एशियाड में उसका चयन नहीं हो सका था। इसके बाद से ही मन में ठान लिया था कि 2023 में होने वाले एशियाड में शामिल भी होना है और पदक भी जीतना है। बकौल प्राची, इस बात का अफसोस है कि हमारे क्षेत्र में खिलाड़ियों को लेकर कोई भी ज्यादा सक्रिय नहीं है। पड़ोसी राज्य हरियाणा में खिलाड़ियों को बेहद मान-सम्मान मिलता है। यदि यहां पर भी खिलाड़ियों को बेहतर सुविधाएं मिले तो यहां के खिलाड़ी भी किसी से कम नहीं है। बता दें, कि प्राची इससे पहले भी अलग-अलग चैंपियनशिप में काफी पदक जीत चुकी है।
पापा उधार रुपये मांगकर मेरे लिए लाते थे स्पाइक
बातचीत के दौरान परिवार की आर्थिक स्थिति को लेकर प्राची भावुक भी हुई। प्राची का कहना है कि उसके पिता जयवीर सिंह खेतीबाड़ी करते हैं। रिले दौड़ के लिए उसे स्पाइक और रनिंग शूज चाहिए होते थे। कई बार ऐसा भी हुआ कि फटे हुए शूज डालकर दौड़ करनी पड़ी, लेकिन पापा नहीं चाहते थे कि बेटी को कहीं पर भी बाधा आए। इसलिए लोगों से कर्ज लेकर उसे शूज दिलाते थे। कई बार खाने की डाइट भी उस स्तर की नहीं रहती थी जो एक एथलीट के लिए जरूरी है, लेकिन माता-पिता, भाई और परिवार के सभी सदस्यों के हौसलों की बदौलत इस मुकाम तक पहुंच सकी। मेरी इस उपलब्धि में पूरे परिवार का सहयोग है।
यह भी पढ़ें: एशियन गेम्स 2023: बेटियों ने पदक जीत निभाई जिम्मेदारी, कल मेरठ आ सकती हैं पारुल और अन्नू रानी, जश्न की तैयारी