सहारनपुर में तीन मौजूदा विधायक और एक पूर्व विधायक समेत छह प्रमुख नेता अपने दलों को छोड़कर दूसरे दल की राजनीति में न सिर्फ सक्रिय हैं बल्कि पांच तो टिकट लेकर चुनावी मैदान में ताल ठोंक रहे हैं, जबकि छठा भी टिकट की होड़ में आगे है।
बसपा के जगदीश राणा के सैफई महोत्सव में शामिल होने के बाद उनकी पार्टी में अनदेखी की जाने लगी। जिसके चलते 2016 के शुरू में वे बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए।
अपने भाई के भाजपा में शामिल होने के बाद बसपा के बेहट से विधायक महावीर राणा भी भाजपा में आ गए। उसके बाद से वह भाजपा में राजनीति कर रहे हैं। अब उन्हें बेहट से ही भाजपा का उम्मीवार घोषित किया गया है।
बसपा छोड़ने के बाद स्वामी प्रसाद मौर्य से बसपाइयों ने दूरी बना ली थी, लेकिन स्वामी प्रसाद मौर्य नकुड़ से बसपा के विधायक डॉ. धर्म सिंह सैनी की भाभी के निधन पर शोक व्यक्त करने के लिए उनके घर पहुंच गए। इस घटना के बाद डाक्टर धर्मसिंह सैनी की बसपा में उन्हें दरकिनार कर दिया।
उनका टिकट भी काट दिया। जिससे क्षुब्ध होकर डॉ. धर्म सिंह सैनी ने भाजपा का दामन थाम लिया। भाजपा ने उन्हें नकुड़ से भाजपा का उम्मीदवार घोषित कर दिया। कांग्रेस के टिकट पर प्रदीप चौधरी गंगोह से चुनाव जीते थे।
उन्हें रसीद मसूद का खास माना जा रहा था, लेकिन रसीद मसूद के सपा में जाने के बाद वह इमरान मसूद से तालमेल नहीं बैठा पाए और पार्टी छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। भाजपा ने उन्हें गंगोह से चुनावी मैदान में उतार दिया है।
बसपा से देवबंद के विधायक रहे मनोज चौधरी 2012 में चुनाव हार गए थे। देवबंद के उपचुनाव से ठीक पहले बसपा छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए थे। उन्हें सहारनपुर देहात से चुनावी मैदान में ताल ठोंकने के लिए उतार दिया है।
पिछले विधानसभा चुनावों में कांग्रेस के टिकट पर सहारनपुर देहात सीट से चुनाव लड़े अब्दुल वाहिद भी अब दल बदलकर सपा का दामन थाम चुके हैं। इसका उन्हें फायदा भी मिला और फिलहाल सपा ने उन्हें सहारनपुर देहात सीट से ही चुनावी मैदान में उतार दिया है।
जबकि रामपुर मनिहारन से सपा के टिकट पर चुनाव लड़ चुके विश्वदयाल छोटन भी अब दल बदलकर कांग्रेस में शामिल हो चुके हैं। हालांकि अभी तक उन्हें टिकट नहीं मिल पाया है, लेकिन उनकी टिकट को लेकर कांग्रेस में दावेदारी बताई जा रही है।