छुटमलपुर। अंग्रेजी शासनकाल में वर्ष 1804 में बने और चंद दिन पहले तक दिल्ली-देहरादून राष्ट्रीय राजमार्ग का हिस्सा रहे मोहंड-आसारोड़ी सड़क मार्ग का 222 साल पुराना सफर खत्म गया है। एक बार फिर से यह शिवालिक जंगल का हिस्सा बनने जा रहा है। इस पर हिरन फिर कुलांचे भरेंगे और हाथियों के झुंड मस्तानी चाल चलेंगे।
शिवालिक जंगल के बीच से निकाली गई इस सड़क ने सभ्यता के बड़े बदलाव को नजदीक से देखा है। कभी इसके कच्चे रास्ते पर घोड़ों से शुरू हुआ सफर पचास साल पहले डामर की सड़क पर तेज रफ्तार कारों के फर्राटा भरने तक पहुंचा। दिन में कई-कई घंटों का जाम भी इस सड़क मार्ग ने झेला। धुएं के गुबार और गाड़ियों के इंजन के शोर से जंगल और इसके बाशिंदे परेशान हुए। दिन तो छोड़िए रात में भी इस पर सुकून नहीं था। वक्त ने करवट बदली और विकास का पहिया शिवालिक जंगल और राजाजी टाइगर रिजर्व के ऊपर से दौड़ा, जिसने एशिया के सबसे लंबे वन्य जीव गलियारे के रूप में आकार लेकर देशभर में अपनी पहचान बनाई। शिवालिक जंगल की स्वच्छंदता और मोहंड रो नदी नीचे रह गई। अब इसके पानी के बहने की कल कल की मधुर ध्वनि वन्य जीवों को आकर्षित करेगी। नीचे वाहनों का शोर थम गया।
लोगों को जहां जाम से निजात मिली है वहीं वन और वन्य जीवों को कोलाहल, प्रदूषण और जंगल में आदमी के अनावश्यक हस्तक्षेप से अनंत काल के लिए मुक्ति मिल गई है। पुराने सड़क मार्ग के किनारे फिर से हरियाली लौटने की राह बन गई है। वन विभाग ने इसके हस्तांतरण की प्रक्रिया शुरू कर दी है। गणेशपुर में बैरिकेड लगा कर इस सड़क की तरफ बढ़ने वालों को रोका जा रहा है। शिवालिक जंगल में इस सड़क मार्ग का सुखांत अंत हो गया है।