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चीन से जंग में शहीद हुआ था चिराऊ का लाल

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बड़गांव के चिराऊ गांव में शहीद सुखबीर सिंह के बेटे सुभाष व भतीजे कवरपाल सिंह - फोटो : SAHARANPUR
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शहीद सुखबीर के बेटे बोले, चीन को सबक सिखाना जरूरी
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बड़गांव (सहारनपुर)। गलवां घाटी में भारतीय सैनिकों की शहादत ने गांव चिराऊ के शहीद सुखबीर सिंह के परिवार की यादें ताजा कर दी हैं। सुखबीर सिंह 36 साल के थे, जब वह 1962 की भारत-चीन की जंग में सरहद पर शहीद हो गए थे। शहीद के दोनों बेटों और भतीजे का कहना है कि चीन को उसकी इस हरकत का जवाब देना बहुत जरूरी है।
सहारनपुर की रामपुर मनिहारान तहसील के गांव चिराऊ निवासी गझन सिंह के पांच बेटों में सबसे छोटे सुखवीर सिंह भारतीय सेना में तोपखाना विभाग में नायक के पद पर तैनात थे। 1962 में भारत-चीन युद्ध में वे शहीद हो गए थे। एक साल तक तो उनकी शहादत का परिजनों को पता भी नहीं चला था। उनकी पत्नी मछला देवी अपने दो मासूम बेटों सुभाष और सुरेंद्र के साथ सीमा से पति के आने का इंतजार करती रहीं। एक साल बाद उनकी शहादत की खबर आई। कुछ सैनिक उनके घर पति का बक्सा और बिस्तर लेकर पहुंचे थे। शहीद सुखबीर सिंह के बेटे सुभाष और सुरेंद्र खेती बाड़ी करते हैं। उनकी मां का स्वर्गवास हुए भी 25 साल बीत चुके हैं। दोनो भाइयों को पिता का चेहरा तो याद नहीं, लेकिन भारत चीन युद्ध का जिक्र आते ही गर्व से उनका सीना तन जाता है। दोनों भाइयों का कहना है कि अब भारत पहले वाला नहीं रहा है। अब हमारा देश चीन का मुकाबला करने में पूरी तरह सक्षम है। चीन को उसकी इस ओछी हिमाकत का जवाब देश को जरूर देना चाहिए। भारतीय सेना चीन को सबक सिखाने में सक्षम है। ऐसे में राष्ट्रीय नेतृत्व को इस वक्त कड़ा निर्णय लेना चाहिए।
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शहीद के भाई भी सेना मेें थे
शहीद सुखबीर सिंह के भतीजे कंवरपाल चौहान बताते हैं कि उनके पिता धूम सिंह भी सेना में थे। वे भी भारत-चीन सीमा पर ड्यूटी पर तैनात थे। बाद में उन्होंने सेना की नौकरी छोड़ सीआरपीएफ ज्वाइन कर ली थी।
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