सहारनपुर जिले में कुपोषण के दंश को मिटाने के लिए प्रशासन ने पूरा जोर लगा दिया। गांव-गांव, घर-घर जाकर वजन कराया, बच्चों को चिह्नित किया और विशेष ट्रीटमेंट दिया। एनआरसी में रखवाया गया, लेकिन कुपोषित बच्चों की संख्या में अभी भी कमी नहीं आ सकी है।
प्रदेश और केंद्र की सरकारें विकास और उपलब्धियों को खुले मंच से गिनवा रही हैं। कागजी आंकड़े तैयार कर जमकर दावे किए जा रहे हैं, लेकिन जिले के कुपोषण की हालत सरकार और प्रशासन के दावों को खोखला साबित कर रही हैं।
छह माह से अधिक हो गए सिर्फ कुपोषण के खिलाफ मुहिम को चलाए, लेकिन कुपोषण की स्थिति अनियंत्रित ही होती जा रही है। वजन दिवस के कार्यक्रम के आयोजन से पहले विभागीय रिकार्ड में एक हजार से भी कम संख्या अति कुपोषित बच्चों की रही।
लेकिन घर-घर जाकर सर्वे किया गया, लोगों को जागरूक किया गया। वजन कराया गया तो पहले महीने में लगभग 18 हजार बच्चे अति कुपोषित और लगभग 50 हजार बच्चे कुपोषित मिले।
अगले माह वजन कराया गया तो अति कुपोषित बच्चों की संख्या 20 हजार को पार कर गई और कुपोषित बच्चों की संख्या भी लगभग 55,000 तक पहुंच गई।
मार्च के राज्य पोषण मिशन के आंकड़ों के अनुसार 5 वर्ष तक के 345931 बच्चों में से 314652 बच्चों का वजन किया गया। जिनमें से 19269 बच्चे अति कुपोषित मिले और 54756 कुपोषित बच्चे पाए गए।
लेकिन अप्रैल में कुपोषित बच्चों की संख्या 55124 तक पहुंच गई। हालांकि अति कुपोषित बच्चों की संख्या 18384 रही। जिले में कुल 73508 बच्चे अभी भी कुपोषित हैं।
अति कुपोषित बच्चों में से लगभग तीन हजार बच्चे ऐसे बताए जा रहे हैं, जो क्रिटिकल की श्रेणी में हैं। इन्हें न सिर्फ अच्छे, पोषक भोजन की आवश्यकता है, बल्कि इन्हें तुरंत उपचार की जरूरत है।
एक ओर जिले में जहां 73500 से अधिक बच्चे कुपोषित हैं, वहीं इनका उपचार कराने के लिए प्रशासन के पास सिर्फ 10 बेड की ही व्यवस्था है। पोषण पुनर्वास केंद्र (एनआरसी) में बच्चे को कम से कम 14 दिन तक रखा जाता है।