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छोटे बच्चों को जबरन रोजा रखवाना जायज नहीं

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सहारनपुर। जमीयत दावतुल मुसलिमीन के संरक्षक मौलाना कारी इस्हाक गोरा ने हेल्पलाइन के जरिए रोजेदारों के सवालों का जवाब दिया। उन्होंने कहा कि रोजेदारों की दुआ अल्लाह फौरन कुबूल करता है। रोजेदारों को चाहिए कि वह अपने-अपने परिवार और देश की खुशहाली एवं तरक्की के लिए खूब दुआ करें।
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सवाल:- चिलकाना निवासी इकबाल महमूद ने पूछा कि मेरे बेटे की उम्र नौ साल है और वह काफी कमजोर है। मेरे परिवार के लोग उसको रोजा रखवाने की जिद कर रहे हैं। क्योंकि, हमारे परिवार में बहुत छोटी उम्र से ही बच्चों को रोजा रखवाने का रिवाज चला आ रहा है। ऐसी सूरत में शरीयत क्या कहती है।
जवाब:- कम उम्र के बच्चों को नाम या शोहरत या रीति रिवाज की खातिर रोजा रखवाना मुनासिब नहीं है, बल्कि जबरदस्ती रोजा रखवाना एक तरह का गुनाह है। चांद की तारीखों के एतबार के मुताबिक बच्चा 15 वर्ष का बालिग होता है। यदि उससे पहले बालिग हो जाए तो रोजा फर्ज होगा। शरीयत के अनुसार बच्चों को रोजा रखवाने की आदत शुरू करने का बेहतर तरीका है कि 10 या 11 वर्ष की उम्र से रोजा रखवाने की आदत डालें। ताकि बालिग होते होते वह रोजा रखने लगे।
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सवाल : गंगोह से शाकिर अली ने पूछा कि वह रोजे की हालत में सिर पर तेल लगाना चाहते हैं। उनके पड़ोसी कहते हैं कि रोजे की हालत में तेल लगाने से रोजा टूट जाता है। क्या यह सही बात है।
जवाब : जो लोग यह समझते हैं कि रोजे की हालत में तेल लगाने से रोजा टूट जाता है, यह बात सरासर गलत है। रोजे की हालत में जिस्म के किसी भी हिस्से पर तेल लगाया जा सकता है। इससे रोजे पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
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