अंग्रेजियत का दिखावा छोड़ हिंदी से करना होगा प्रेम
सहारनपुर। मातृभाषा हिंदी की बेहतरी के लिए जरूरी है कि अंग्रेजियत से किनारा किया जाए। टूटी फूटी अंग्रेजी भाषा का आवरण खुद पर चढ़ाने से बचा जाए और दिन की शुरुआत से ही मातृभाषा को प्राथमिकता दें। यह विचार हिंदी हैं हम अभियान के तहत कराए गए वेबिनार के दौरान साहित्यकार, लेखक, प्रोफेसरों और अन्य वर्ग के लोगों ने व्यक्त किए।
बतौर मुख्य वक्ता मुंबई से जुड़े पटकथा लेखक सीएल सैनी ने भारतेंदु हरिश्चंद्र की पंक्तियां - निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल, बिन निज भाषा-ज्ञान के, मिटत न हिय को सूल। पढ़कर अपनी बात शुरू की। उन्होंने कहा कि आज के परिवेश में अंग्रेजियत हावी हुई है, लेकिन उसका नुकसान ही हुआ है। क्योंकि ठीक तरह से अंग्रेजी बोलनी, पढ़नी आती नहीं है, मगर हिंदी से भी दूरी हो गई है। आज हिंदी में हर काम होता है। ऑनलाइन किसी भी सोशल साइट पर हिंदी में सबकुछ उपलब्ध होता है। हमें गर्व करना चाहिए हिंदी पर। उन्होंने कहा कि चंद्रकांता ऐसी रचना है, जिसको पढ़ने के लिए विदेशियों को भी हिंदी सीखने को मजबूर होना पड़ा। मुन्ना लाल एंड जयनारायण कॉलेज की हिंदी विभागाध्यक्ष डॉ. जया ने कहा कि नई शिक्षा नीति में एक सकारात्मक विचार सम्मिलित किया गया है, जिससे कक्षा पांच तक के बच्चे अपने शिक्षा स्वयं की मातृभाषा, स्थानीय या क्षेत्रीय भाषा में ग्रहण करेंगे। इसे कक्षा आठ या आगे बढ़ाने की भी बात कही गई है। ऐसा करने से भाषाओं के विकास के साथ साथ शिशुओं के कोमल मन और मस्तिष्क को उस बोझ से भी मुक्ति मिलेगी जो एक अपरिचित भाषायी आतंक के रूप में उन पर हावी रहता था।
मुन्ना लाल एंड जयनारायण कॉलेज में एसोसिएट प्रोफेसर सुमेधा नीरज ने कहा कि मातृभाषा संकल्प शक्ति, आत्मशक्ति में वृद्धि का महत्वपूर्ण आधार है। यह हमें मनोवैज्ञानिक संतुष्टि का अहसास कराती है। हमें बच्चों को मातृभाषा का ज्ञान बाल्यकाल से ही देना प्रारंभ करना होगा तभी हम इनका सर्वांगीण विकास कर पाएंगे। उन्होंने कहा कि - चिड़िया तो चहचहाती है, सिंह दहाड़े मारे, हम तो हिंदी भाषी हैं तो हिंदी को ही स्वीकारें।
शिक्षक आदित्य शर्मा ने कहा कि हिंदी इतनी गहरी भाषा है, जिसे पार पाना आसान नहीं है। परिवार के बड़ों से हिंदी के लिए जो प्रेरणा मिलती थी, मगर वह बंद हो गई है। पाठ्यक्रम में बदलाव भी इसका कारण है।
अनुज प्रताप ने कहा कि हिंदी की खातिर परिवार से ही संस्कार देने होंगे। मातृभाषा हिंदी के उच्चारण में जो भाव है, वह दूसरी भाषाओं में नहीं मिलता है। इसके आध्यात्मिक भाव अनूठा है, जैसे मां शब्द की कोई उपमा नहीं है।
हिंदू कन्या इंटर कॉलेज की प्रधानाचार्या कुदसिया अंजुम ने कहा कि हिंदी एक जीवंत भाषा है। आम बोलचाल की भाषा है, भारतीयों को एकसूत्र में पिरोने वाली भाषा है। मगर अक्सर हम देखते हैं कि मां बाप बच्चों को अंग्रेजी बोलने की ओर प्रेरित करते हैं, जिससे बच्चे के मन में हीन भावना आती है कि मुझे हिंदी बोलनी आए न आए अंग्रेजी जरूर बोलनी आनी चाहिए।
इनके अलावा योगेश कुमार, केके गर्ग ने भी विचार व्यक्त किए। वेबिनार के आयोजन में मानसी अभिनय गुरुकुल सहारनपुर की टीम का विशेष सहयोग रहा।