सतीश ने बताया कि देश के लिए ओलंपिक में मेडल जीतने का सपना देखा था, लेकिन शादी जल्दी हो गई। तीन बेटियां हुईं, जिनकी परवरिश के लिए रोजी-रोटी की जद्दोजहद में फंस गए और खेल को छोड़ना पड़ा। एक के बाद एक कई काम किए। अब स्टेडियम में बतौर अस्थायी कर्मचारी तैनात हैं।
अब रोजगार पहले नंबर पर, दूसरे पर खेल
सतीश बताते हैं कि खिलाड़ी होने के नाते उन्हें तमाम खेल अधिकारियों से स्नेह मिला है। लेकिन घर चलाने के लिए पैसे की जरूरत होती है, जिसके लिए रोजगार पहले नंबर पर हो गया और खेल दूसरे नंबर पर।
हर जिम्मेदारी को लगन से निभाते हैं सतीश
खेल अधिकारी अनिमेष सक्सेना का कहना है कि सतीश कुमार मेहनती हैं। वह पूरी लगन के साथ अपनी जिम्मेदारी को निभाते हैं। जब से पता चला है कि वह राष्ट्रीय स्तर के धावक हैं, तब से उनके लिए दिल में इज्जत और बढ़ी है। दुर्भाग्य से वह अपने सपने को पूरा नहीं कर सके, लेकिन विभाग की सहानुभूति उनके साथ है।