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गुमनाम एथलीट: सतीश ने कभी ओलंपिक में मेडल जीतने का देखा था सपना, आज सफाई करने और कूड़ा उठाने को हुए मजबूर

Thu, 01 Aug 2024 03:37 PM IST
मोहम्मद मुस्तकीम जगदीप कुमार, सहारनपुर

सार

आज हम आपको ऐसे खिलाड़ी की कहानी बताएंगे, जिसने राष्ट्रीय स्तर तक नाम कमाया, लेकिन पारिवारिक हालातों के चलते वह गुमनामी की जिंदगी जी रहा है। ये एथलीट सतीश हैं, जो आज डॉ. भीमराव आंबेडकर स्टेडियम में मैदान की सफाई से लेकर कूड़ा उठाने तक काम कर रहे हैं।
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स्टेडियम में सफाई कार्य करते सतीश। - फोटो : Amar ujala
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विस्तार
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सतीश मूल रूप से नकुड़ क्षेत्र के गांव भैरमऊ के रहने वाले हैं। वह वर्ष 1987 से जनपद और मंडल से लेकर राज्य एवं राष्ट्रीय स्तर की दौड़ प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग कर रहे हैं। उन्होंने भी ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतने का सपना देखा था, लेकिन घर की जिम्मेदारी और आर्थिक तंगी ने उनको खेल से दूर कर दिया। 

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हालांकि खेल का जुनून ऐसा है कि वह आज भी वेटरन प्रतियोगिताओं में प्रतिभाग करते हैं। बीते वर्ष बंगलूरू में हुई राष्ट्रीय दौड़ प्रतियोगिता में वह छठे स्थान पर रहे थे। वह राज्य स्तर की नौ और राष्ट्रीय स्तर की चार प्रतियोगिताओं में भाग ले चुके हैं।

सतीश ने बताया कि देश के लिए ओलंपिक में मेडल जीतने का सपना देखा था, लेकिन शादी जल्दी हो गई। तीन बेटियां हुईं, जिनकी परवरिश के लिए रोजी-रोटी की जद्दोजहद में फंस गए और खेल को छोड़ना पड़ा। एक के बाद एक कई काम किए। अब स्टेडियम में बतौर अस्थायी कर्मचारी तैनात हैं। 

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अब रोजगार पहले नंबर पर, दूसरे पर खेल
सतीश बताते हैं कि खिलाड़ी होने के नाते उन्हें तमाम खेल अधिकारियों से स्नेह मिला है। लेकिन घर चलाने के लिए पैसे की जरूरत होती है, जिसके लिए रोजगार पहले नंबर पर हो गया और खेल दूसरे नंबर पर। 

हर जिम्मेदारी को लगन से निभाते हैं सतीश
खेल अधिकारी अनिमेष सक्सेना का कहना है कि सतीश कुमार मेहनती हैं। वह पूरी लगन के साथ अपनी जिम्मेदारी को निभाते हैं। जब से पता चला है कि वह राष्ट्रीय स्तर के धावक हैं, तब से उनके लिए दिल में इज्जत और बढ़ी है। दुर्भाग्य से वह अपने सपने को पूरा नहीं कर सके, लेकिन विभाग की सहानुभूति उनके साथ है।
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