एफआरयू का दर्जा तो मिला पर सुविधाएं का इंतजार
छुटमलपुर। फतेहपुर सीएचसी को शासन ने एफआरयू का दर्जा तो दे दिया लेकिन सुविधाओं के मामले में इसका स्तर सीएचसी के बराबर भी नहीं है। हालत यह है कि इमारत की छत बरसात में टपकती है। प्लास्टर जर्जर होकर गिर रहा है। वार्डों की हालत बदतर है। दवाइयों और कर्मचारियों के अभाव में मरीज मजबूरन निजी अस्पतालों का रुख कर लेते हैं।
वर्ष 1992 में शासन ने फतेहपुर भादो में 30 बिस्तर के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र का निर्माण कराया गया था। वर्तमान में इस इमारत की हालत जर्जर हो चुकी हैं। हाल ही में हुई बारिश में डाट्स रुम का रिकार्ड भीग कर खराब हो गया था। बाल रोग विशेषज्ञ, पैथालोजिस्ट, रेडियोलोजिस्ट और पांच स्टाफ नर्स के पद रिक्त पड़े हैं। पूर्णकालिक सर्जन नहीं है। ऐसे में डिलीवरी के लिए सहारनपुर की दौड़ लगानी पड़ती है।
केंद्र पर ब्लड स्टोरेज यूनिट बनाई गई थी लेकिन अब तक चालू नहीं हो पाई। लैब में एक साल पहले आटो एनालाइजर आ गया था लेकिन केमिकल्स के अभाव में यह धूल फांक रहा है। शिशु स्थिरीकरण इकाई भी स्थापित नहीं हो पाई है। अस्पताल की चहारदीवारी के बाहर से गुजर रहा नाला स्थायी अतिक्रमण का शिकार है। इन सब समस्याओं के बावजूद स्वास्थ्य विभाग के अफसर इस तरफ कोई ध्यान नहीं दे रहे हैं।
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शुरू नहीं हो पाया जच्चा-बच्चा अस्पताल
दो साल पूर्व अस्पताल केंद्र परिसर में करीब ढाई करोड़ रुपये की लागत से 30 बिस्तर का बना जच्चा-बच्चा अस्पताल स्वास्थ्य विभाग को हैंडओवर कर दिया गया था। यह चिकित्सकों, स्टाफ की तैनाती न होने और जरूरी संसाधनों के अभाव में अब तक चालू नहीं हो पाई है। बंद पड़ी खाली इमारत धीरे धीरे जर्जर हो रही है।
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उच्चाधिकारियों को हालात से कई बार अवगत कराया गया है। लेकिन बजट के अभाव में मरम्मत आदि का कार्य नहीं हो पा रहा है। चिकित्सकों, स्टाफ की तैनाती और संसाधनों की उपलब्धता का मामला शासन स्तर का है। वे उपलब्ध संसाधनों में बेहतर चिकित्सा सुविधा मुहैया कराने का प्रयास कर रहे हैं।
डा नवदीप गुप्ता
प्रभारी सीएचसी फतेहपुर
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इमारत की मम्मरत के लिए बजट को शासन स्तर पर लिखा जा चुका है। रही बात जच्चा बच्चा अस्पताल में तैनाती की तो चिकित्सक और स्टाफ आते ही वहां तैनात कर दिया जाएगा। फिलहाल वहां का कार्य सीएचसी में ही कराया जा रहा है।
डॉ बीएस सोढ़ी
मुख्य चिकित्साधिकारी सहारनपुर