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पश्चिमी यूपी की लोक कला को विलुप्त कर रहा बाजार वाद

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सांझी माई - फोटो : SAHARANPUR
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सहारनपुर। बाजार वाद की वजह से पश्चिमी यूपी की लोककला सांझी माई के अस्तित्व पर संकट आ गया है। कभी तालाबों की मिट्टी से सांझी माई के साथ उनके भाई, आकाश में उड़ते तोते, वन में नाचता मोर, चांद, सूरज बनाए जाते थे, लेकिन अब सांझी माई बनाने की लोककला लुप्त होती जा रही है। देहात क्षेत्रों में थोड़ा-बहुत अब भी इस परंपरा को निभाया जा रहा है, लेकिन शहरी क्षेत्र में ऐसा न के बराबर ही है। यही स्थिति रही तो यह लोककला किताबों के पन्नों तक सिमटकर रह जाएगी, क्योंकि बाजार में आधुनिक मूर्तियां बिक रही हैं, जो इस लोक कला को लगभग खत्म कर रही हैं।
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सांझी माई को समृद्धि, उत्थान और उन्नति का प्रतीक और मां भगवती का ही रूप माना गया है। श्रद्धालुओं के घरों में सांझी के रूप में देवी नौ दिन तक निवास करती है। यह नौ दिन का सफर तालाब से ही शुरू होता है और तालाब पर ही खत्म होता है। जानकार बताते हैं कि सांझी बनाने, पूजने और विसर्जन की धार्मिक क्रियाएं उस समय शुरू की गई थीं, जब सांझी माई के साथ सिर्फ तालाब का महत्व जुड़ा है। गांव की महिलाएं अपने हाथों से खुद तालाब की मिट्टी से घर लाती थी। घर में उसी मिट्टी से सांझी माई और उनके के परिवार का निर्माण करती थी। नौ दिन तक सांझी माई को पूजन के बाद गांव के बच्चे, महिलाएं आदि समूह के साथ गीत गाते हुए तालाब के किनार पहुंचते थे। विधि-विधान से के साथ सांझी माई का तालाब में विसर्जन किया जाता था। जानकार बताते हैं कि ढाई दशक पूर्व तक सांझी माई के साथ उनका भाई सांझा, आकाश में उड़ते तोते, वन में नाचता मोर, चमचमाते तारे, चांद, सूरज भी बनाए जाते थे। आधुनिकता के दौर में यह लोककला लुप्त होती जा रही है।
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बिल्कुल अलग हैं बाजार में आई मूर्तियां
सहारनपुर। इस लोककला पर बाजार वाद हावी हो गया है। क्योंकि, बाजार में जो मूर्तियां बिक रही हैं, वह सांझी माई के स्वरूप से बिल्कुल अलग हैं। सांझी माई का मिट्टी से खुद लोग अपने हाथों से बनाते थे और गोबर से दीवार पर चिपकाते थे, जो छह फिट लंबी और चार फिट चौड़ी होती थी, लेकिन इनकी जगह अब मूर्तियों ने ले ली है और मूर्तियों में सांझी माई का परिवार भी प्रदर्शित नहीं किया गया है। इसी वजह से यह लोककला खत्म होती जा रही है।
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हरियाली और खुशहाली का प्रतीक हैं तोते
सहारनपुर। सांझी माई के साथ तोते जरूर बनाए जाते हैं। इन तोतों को सांझी के चारों और विशेष रूप से सजाया जाता है। तोते को एक ऐसा पक्षी माना गया है, यह जहां भी निवास करता है, वहां हरियाली और खुशहाली दोनों होती हैं। सांझी माई के साथ सूरज, चांद, और सितारे भी बनाए जाते हैं जो स्थायित्व और ऊर्जा के रूप का प्रतीक माना गया।
किसान है तो बनाते हैं हल, पुरोहित हैं पंडित
सहारनपुर। यदि कोई व्यक्ति खेती करता है तो वह मां सांझी के साथ मिट्टी का हल भी बनाकर लगाता है। अगर कोई पुरोहित है तो वह पंडित का स्वरूप बनाता है। ऐसे में सांझी माई को देखकर उस परिवार के आर्थिक, सामाजिक ढांचे को समझा जा सकता है।
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लोककला को बचाना बेहद जरूरी: उपाध्याय
सहारनपुर। विरासत यूनिवर्सिटी हैरीटेज रिसर्च सेंटर शोभित विश्वविद्यालय के कोआर्डिनेटर और संस्कृति मंत्रालय भारत सरकार से प्रकाशित पुस्तक हमारा सहारनपुर के लेखक राजीव उपाध्याय का कहना है कि सांझी पश्चिमी यूपी की लोककला है, जो बाजार वाद की वजह से लुप्त होती जा रही है। सांझी हमारी प्राचीन लोककला है। इसको बचाना बेहद जरूरी है। ऐसा न हुआ तो सांझी माई की बातें सिर्फ किताबों के पन्नों तक सिमटकर रह जाएंगी।
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