दारुल उलूम के मुफ्तियों ने एक सवाल के जवाब में साफ तौर पर डॉक्टरी पेशे में कमीशनखोरी को सरासर नाजायज करार दिया है।
भारत ही नहीं बल्कि दूसरे देशों में भी डॉक्टरों को इंसानी जान बचाने के चलते भगवान तक कहा जाता है लेकिन इस पेशे में कमीशनखोरी का चलन बढ़ने से गरीब तबका बेहतर उपचार से वंचित रहता है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत के एक व्यक्ति ने 7 अगस्त को दारुल उलूम के मुफ्तियों से सवाल संख्या 67643 में पूछा कि एक मरीज डॉक्टर के पास जाता है।
डॉक्टर मरीज को देखने के बाद कुछ जांच लिखता है फिर वह रोगी जिस प्रयोगशाला में जाता है इसके मालिक इस जांच की वास्तविक राशि से दोगुना लेते हैं, क्योंकि उन्हें इस जांच का आधा मूल्य (कमीशन) डॉक्टर को देना पड़ता है, और अगर कोई लैब डॉक्टर को हिस्सा न दे तो डॉक्टर इस लैब की जांच को गलत कहते हैं और इस प्रयोगशाला में फिर मरीज को नहीं जाने देते।
इसी तरह मेडिकल स्टोरों से दवा लेने पर भी डॉक्टर कमीशन लेते हैं। अगर कोई मुस्लिम डॉक्टर लैब या मेडिकल स्टोर से दवा या परीक्षण के नाम पर कमीशन लेता है तो यह जायज है या नाजायज?।
सवाल पर मुफ्तियों की खंडपीठ ने जवाब संख्या 67643 में कहा कि डॉक्टर लैब या मेडिकल स्टोर वालों से मरीज भेजने पर या मेडिकल स्टोर वालों की दवाईयां लिखने पर जो कमीशन लेते हैं, ये शरई में जायज नहीं है।
उन्होंने कहा कि किसी जमाने में हकीम लोग दवाई लिखने पर अत्तार (दवा विक्रेता) से 25 फीसद या उससे कम कमीशन लेते थे। हमारे हजरात अकाबिरे उलेमा देवबंद ने अपने फतवे में इसे रिश्वत और नाजायज करार दिया है।