जिंदगी के लिए करीब तीन महीने से जंग लड़ रही मासूम खुशी आखिरकार मौत से हार गई। खुशी ने दिल्ली रोड स्थित एक निजी अस्पताल में सोमवार की सुबह अंतिम सांस ली। अमर उजाला ने अभियान चलाकर खुशी के परिवार को मदद दिलाने का प्रयास किया।
इसके बाद सरकार के संज्ञान लेने के बाद प्रोबेशन विभाग रिपोर्ट तैयार करने में लगा रहा, लेकिन खुशी के पास इतना समय नहीं था। विभाग इससे पहले सरकार को रिपोर्ट भेजता, खुशी नहीं रही।
अमर उजाला ने 30 मई के अंक में खुशी की बीमारी और परिवार की लाचारी के समाचार को प्रमुखता से प्रकाशित किया था। उसके बाद मदद करने वालों के हाथ बढ़े। परिवार को बच्ची के इलाज के लिए कुछ धनराशि मिली भी।
इतना ही नहीं, कई लोगों ने अमर उजाला को फोन कर खुशी की जिंदगी बचाने के लिए अपनी किडनी तक देने की बात कही। राज्य सरकार ने भी अमर उजाला के समाचार का संज्ञान लेते हुए जिला प्रोबेशन अधिकारी से खुशी की बीमारी के संबंध में रिपोर्ट मांगी।
पिछले करीब पांच दिन से विभाग रिपोर्ट तैयार करने में जुटा था। मंगलवार को जिला प्रोबेशन अधिकारी पुष्पेंद्र सिंह रिपोर्ट लेकर लखनऊ पहुंचने वाले थे। मगर पांच दिन से दिल्ली रोड स्थित एक निजी अस्पताल के आईसीयू में भर्ती खुशी के पास इतना समय नहीं था। सोमवार की सुबह उसने दम तोड़ दिया। यह कहना गलत नहीं होगा कि बीमारी के साथ ही आर्थिक तंगी भी खुशी की मौत की प्रमुख वजह रही है।
चंडीगढ़ के चिकित्सकों ने करीब दो महीने पहले ऑपरेशन की सलाह दी थी, जिस पर मोटी रकम खर्च होनी थी, मगर पैसा न होने की वजह से परिवार लाचार रहा। खुशी की मौत से परिवार में कोहराम मचा है, साथ ही मददगारों की आंखें भी नम हैं।