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संरक्षण के अधिकार के बावजूद न्याय को भटक रहे उपभोक्ता

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संरक्षण के अधिकार के बावजूद न्याय को भटक रहे उपभोक्ता
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केस नंबर एक : शहर के चंद्र नगर निवासी सेवानिवृत्त इंजीनियर योगेंद्र कुमार चेक बाउंस मामले में चार साल से इंसाफ के लिए भटक रहे हैं। पहले उपभोक्ता फोरम में जाने का मन बनाया। बाद में सिविल कोर्ट पहुंचे। योगेंद्र का कहना है कि यहां भी तीन साल तारीख पर तारीख में बीत गए हैं। प्रतिभा ने कुछ साल पहले एक शख्स को 10 लाख रुपये दिए थे। उससे चेक मिला, जो बाउंस हो गया। अब 10 लाख पाने के लिए दो लाख रुपये तो केस लड़ने में खर्च हो चुके हैं।
केस नंबर दो : जिला अस्पताल के टीबी सेनेटोरियम में सेवारत कर्मचारी वेदव्रत त्यागी बताते हैं कि अस्पताल परिसर से ही उनकी बाइक 24 जुुुलाई 2018 को चोरी हुई थी। इसके बीमे के लिए जो दस्तावेज मांगे गए, वे संबंधित कंपनी को दे दिए थे। सर्वेयर आया और सत्यापन तक कर लिया। इसके बावजूद अब तक क्लेम नहीं मिला है। उन्हें कंपनी के आफिस देहरादून तक चक्कर लगाने पड़ रहे हैं।
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केस नंबर तीन : विश्वकर्मा नगर पार्वती धाम निवासी सचिन कुमार बताते हैं कि पिछले दिनों उन्हें एक भर्ती परीक्षा में शामिल होना था। कैश की सख्त जरूरत थी। मगर शहर के कई एटीएम में चक्कर काटने पर भी कैश नहीं मिला। जब कैश ही नहीं मिलना तो फिर एटीएम लगाने का क्या औचित्य है। यह व्यवस्था ठीक होनी चाहिए। इसके लिए कई बार बैंक और प्रशासनिक अधिकारियों से संपर्क किया। मगर हालात अब भी ऐसे ही हैं।
केस नंबर चार : जनकपुरी निवासी बीना देवी कुछ साल पहले पति की मौत के बाद चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी के रूप में स्वास्थ्य विभाग में सेवा में आई थीं। लेकिन पति की मौत के बाद अवकाश नगदीकरण के मामले में उसकी फाइल महीनों से अटकी पड़ी है। वह अलग-अलग अफसरों के चक्कर काट चुकी हैं। मगर अब तक न्याय नहीं मिला है।
सहारनपुर। ये कुछ मामले तो बानगी भर हैं। जिले में ही 500 से अधिक उपभोक्ता ऐसे हैं जो बीमा, बैंक लोन, चेक बाउंस प्रकरण, पेंशन, उधार के लेनदेन, कमेटी सहित अन्य कई मामलों को लेकर अपने अधिकारों के लिए संघर्ष कर रहे हैं। सबसे बड़ी समस्या तो यही है कि जिले में उपभोक्ता फोरम एक्टिव नहीं है। इसके चलते सिविल कोर्ट और लोक अदालतों के सहारे न्याय पाने के लिए उपभोक्ता लंबे समय से जूझ रहे हैं। विश्व उपभोक्ता दिवस पर कुछ उपभोक्ताओं से बातचीत के बाद ये हालात सामने आए।
खानपान से लेकर दवाओं तक में शोषण
उपभोक्ताओं के शोषण से जुड़े मामलों में पैरवी करने वाले वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाष त्यागी बताते हैं कि रोजमर्रा की जरूरत वाली चीजों आटा, दाल, घी, मिठाई में मिलावट से लेकर जीवन के लिए बेहद जरूरी दवाओं तक में उपभोक्ताओं को शोषण का शिकार होना पड़ता है। यदि 100 से ज्यादा मिलावटी मामले पकड़े जाएं तो उनमें से कार्रवाई पांच-छह मामलों में ही होती है।
लोक अदालत में कुछ पीड़ितों को मिली राहत
उपभोक्ता फोरम एक्टिव न होने के कारण अधिकतर पीड़ित इन दिनों सिविल कोर्ट और विधिक प्राधिकरण की ओर से आयोजित होने वाली लोक अदालतों का सहारा ले रहे हैं। फरवरी माह में आयोजित राष्ट्रीय लोक अदालत में कुल 2401 मामले सामने आए थे। इनमें से 16 पीड़ित वाहन दुर्घटना के प्रकरण में पहुंचे। इन मामलों के कुछ पीड़ितों को 42 लाख से अधिक की आर्थिक मदद दिलाई गई। इसके अलावा बैंकों में लोन, बीमा, लीज मैटर सहित अन्य प्रकरणों के 358 पीड़ित पहुंचे। इनमें 60 फीसदी पीड़ितों के केस निस्तारित हुए।
सिविल कोर्ट में 180 से अधिक मामले लंबित
बीमा, बैंक लोन, चेक बाउंस, पेंशन, घटिया गुणवत्ता के सामान, बिजली बिलों में उत्पीड़न सहित अन्य कई श्रेणी के 180 से अधिक प्रकरण फिलहाल सिविल कोर्ट में ही लंबित हैं। अधिकतर उपभोक्ताओं को तीन से सात साल तक का समय केस लड़ते हुए हो गया है।
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एक करोड़ तक का क्लेम संभव, लखनऊ तक के चक्कर से बचेंगे
वरिष्ठ अधिवक्ता सुभाष त्यागी ने बताया कि उपभोक्ता फोरम के सदस्य इसी साल मनोनीत हो सकते हैं। इसके सक्रिय होने पर नए नियमों के अनुरूप अब एक करोड़ रुपये तक के क्लेम वाले मामलों का निस्तारण भी हो सकेगा। इससे पहले जिले में फोरम के माध्यम से अधिकतम एक लाख रुपये तक की सीमा निर्धारित थी। इससे अधिक क्लेम की स्थिति पर लखनऊ तक चक्कर काटने पड़ते थे।
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