गंगोह (सहारनपुर)। पवित्र कुरान पाठ के साथ हजरत कुतुबे आलम का 495 वां उर्स आरंभ हो गया है। देश के विभिन्न राज्यों से जायरीनों का आना भी शुरू हो गया है। हजरत कुतुबे आलम की दरगाह में सुबह की नमाज के बाद पवित्र कुरान शरीफ का पाठ किया गया। कुरान पाठ के बाद दरगाह के सज्जादा नशीं शाह महताब आलम द्वारा दुआ कराई गई और तबर्रुकात तकसीम किया गया। नगर की विभिन्न धर्मशालाओं में जायरीनों के ठहरने की व्यवस्था की गई है। अनेक स्थानों पर लंगर भी आरंभ कर दिए गए है।
हरियाणा, पंजाब से आते हैं लाखों श्रद्धालु
गंगोह। हजरत कुतुबे आलम के उर्स के दौरान हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, उत्तराखंड के अलावा विदेशों से आने वाले जायरीन मामू मौला बख्श, हजरत शेख सादिक, अबू सईद की मजारों पर भी मत्था टेकते हैं। यह सभी सूफी संत भी हजरत कुतुबे आलम के वंश से ही संबंध रखते हैं। मामू मौला बख्श के बारे में बताया जाता है कि मात्र 12 वर्ष की आयु में ख्वाजा मुईनुद्दीन चिश्ती अजमेरी के दरबार में हाजिरी देने के बाद उन्होंने अपनी सारी उम्र अपने मुरशीद के यहां गुजारी।
जायरीनों की सुविधाओं के लिए ये किए गए हैं इंतजाम
गंगोह। जायरीनों की सुख सुविधा के लिए दरगाह हजरत कुतुबे आलम के सज्जादानशीं शाह मेहताब आलम, दरगाह मामू आलाबख्श के सज्जादानशीं हाजी इरशाद रब्बानी एवं सज्जादानशीं हकीम शाह जफर कुद्दूसी ने खासे इंतजाम किए हैं। भगत मोहन लाल कुरुक्षेत्र वालों ने जायरीनों के लिए धर्मशाला को सुविधाओं से सुसज्जित करा दिया है। दरगाह मामू आलाबख्श पर जायरीनाें के लिए अंजुमन डेरा बख्शिया ने पीने के पानी के टैंकर का इंतजाम किया है, जबकि दरगाह हजरत कुतुबे आलम में चिकित्सा सुविधा का इंतजाम हजरत कुतुबे आलम चैरिटेबिल ट्रस्ट के जिम्मे सौंपा गया है।
संत बाबा हरिदास को भिजवाया रस्मी तौर पर उर्स का निमंत्रण
गंगोह। विख्यात संत बाबा हरिदास सेवाभाव और त्याग की प्रतिमूर्ति थे। उनके और हजरत कुतुबे आलम के बीच गहरा दोस्ताना रिश्ता था। दोनों के बीच इतना प्यार रहा कि हजरत कुतबे आलम शेख अब्दुल्ल कुद्दूस के गंगोह आगमन पर उन्होंने अतिथि सत्कार धर्म का निर्वाह करते हुए सराय पट्टी स्थित अपनी कुटिया हजरत के लिए खाली कर दी थी। जिसमें हजरत ने लम्बे अरसे तक वास करते हुए अल्लाह की बंदगी की। वर्तमान में भी दरगाह के एक कोने में बाबा हरिदास की कुटिया स्थित है। जिसे हुजरा कहा जाता है। उर्स के मौके पर बाकायदा सबसे पहले संत बाबा हरिदास के पास निमंत्रण भेजने की परंपरा आज तक जारी है। मान्यता है कि उर्स में आने वाले जायरीनों की हाजरी विख्यात संत बाबा हरिदास की समाधि पर जाने के बाद ही कबूल होती है।