प्रेम वही जिसमें पाने की बजाए अपना सब कुछ लूटा दें: आचार्य
देवबंद (सहारनपुर)। श्रीमद्भागवत कथा के पांचवें दिन आचार्य सुभाष चंद ने कहा कि मन ही सारे पापों की खान है। मन के चक्कर में ही जीव चक्कर काटता रहता है। जब मन का चक्कर खत्म हो जाता है तब 84 लाख योनियों का चक्कर भी खत्म हो जाता है।
मधुर मिलन बैंक्वेट हाल में चल रही श्रीमद्भागवत कथा में आचार्य सुभाष चंद ने कहा कि शिशुपाल ने जब श्री कृष्ण को अपशब्द कहा तो भगवान मुस्कुरा रहे थे। इस पर अर्जुन ने कहा हे प्रभु यदि आप कुछ नहीं कर रहे हैं तो मुझे आज्ञा दें। इस पर भगवान श्री कृष्ण ने कहा हे अर्जुन जिसके पास जो रहता है वह वही देता है। दूसरी तरफ शिशुपाल अपनी हदें पार करते बोला तुम बेशर्म होकर हंसते जा रहे हो नीचे आओ बताता हूं। तब भगवान श्री कृष्ण ने बहुत सुंदर जवाब दिया कि मैं इतना नीचे नहीं आ सकता जितना तुम हो। ध्यान रखना जब तक अंदर और बाहर से एक नहीं हो जाओगे और तुम्हारा मन निर्मल न हो जाए तब तक भगवत प्राप्ति मुश्किल है। भगवान की महिमा का गुणगान करते हुए आचार्य सुभाष जी महाराज ने बताया कि जब पुतना कृष्ण के पास आई तब भगवान ने अपनी आंखें बंद कर ली, ताकि उसे देख कर मेरा मोह उसका वध करने में बाधा न बने। प्रेम का वर्णन करते हुए महाराज ने कहा कि प्रेम वही है जिसमें पाने की बजाए अपना सब कुछ लूटा देने की इच्छा हिलोरे मारती रहती है। एक तरह का प्रेम नजरों के रास्ते दिल में उतरने से होता है। दूसरी तरह का प्रेम श्रवण से भी होता है। प्रभु से प्रेम इसी तरह का प्रेम है। भगवान की कथा सुनते सुनते उनसे प्रेम होना दूसरी तरह का प्रेम है। भागवत कथा में श्री कृष्ण की बाल लीलाओं का सुंदर चित्रण किया और कृष्ण गोपाल को छप्पन भोग भी अर्पण किया गया। पांचवें दिन की कथा के यजमान अरविंद कुमार रहे जबकि प्रसाद का वितरण मेघना गोयल ने किया। इस मौके पर मनोज बंसल, अजय गर्ग, विजय कुमार, मनोज बंसल, राजकिशोर गुप्ता, संतोष अग्रवाल, हरिओम सिंघल, चौधरी मंजीत सिंह, चौधरी परविंद्र सिंह आदि मौजूद रहे।