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जयंती पर याद किया

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गंगोह। अंग्रेजों को मैं अपनी झांसी नहीं दूंगी का चेतावनीपूर्ण खुला आह्वान करने वाली भारतीय प्रथम स्वतंत्रता संग्राम की प्रथम वीरांगना झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई को 183वीं जयंती पर उनका भावपूर्ण स्मरण किया गया।
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सोमवार को रामबाग रोड स्थित आर्य भवन पर नारी वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई की 183वीं जयंती पर वैदिक मंत्रोच्चार के साथ यज्ञ-हवन हुआ। केन्द्रीय आर्य शक्ति सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ भाजपा नेता डॉ.वीरसिंह भावुक ने कहा कि नारी वीरांगना झांसी की महारानी लक्ष्मीबाई ने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम में अग्रिम भूमिका निभाकर अपने प्राणों की आहुति दी। उन्होंने अपने दत्तक पुत्र दामोदर राव को अपनी पीठ के पीछे कसकर घोड़े पर सवार होकर अंग्रेजों से युद्ध में अपनी वीरता का परिचय दिया। 23 मार्च 1858 को झांसी का यह ऐतिहासिक युद्ध आरंभ होकर 18जून 1858 को ग्वालियर का अंतिम युद्ध हुआ, जिसमें महारानी ने वीरगति प्राप्त की। वैदिक विदुषी श्रुति प्रिया आर्या ने कहा कि नारियों की प्रेरणास्रोत वीरांगना महारानी लक्ष्मीबाई का जन्म 19 नवंबर 1835 को झाँसी में हुआ और अपने बाल्यकाल से ही मनु नाम से जानी जाती थी। 15 वर्ष की आयु में झांसी के विधुर राजा गंगाधर राव से उनका विवाह हुआ। 21 नवंबर 1853 को पति की मृत्यु पर 18वर्ष की आयु में ही उन्हें झांसी की राजसत्ता संभालनी पड़ी और राज्य की रक्षा के लिए अंग्रेजों से युद्ध किया, जिसमें वीरगति प्राप्त की। उन्होंने कहा कि यहीं से भारत की प्रथम स्वाधीनता क्रांति का बीज प्रस्फुटित हुआ। जसवीर आर्य, ऋषिपाल आर्य, ब्रिजेश सैनी, प्रधान प्रीतम सैनी, सोनू सैनी, मुनेश सैनी, सोमदत्त नामदेव, अनिल बारी, संदीप तायल, मौलवी खालिद, राशिद अंसारी, सुदेश प्रभा आर्या, मधु आर्या, पारुल सैनी, मनीषी तायल, सुरेखा शर्मा, रानी कश्यप आदि रहे। संचालन ब्रिजेश सैनी ने किया।
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