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अब समस्या नहीं आय का जरिया बनेगा कचरा

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सहारनपुर। वर्षों से नगर निगम के लिए सिर दर्द बन रहा कचरा अब कमाई का जरिया बनने जा रहा है। स्मार्ट सिटी योजना के तहत नगर निगम ने दो जगहों पर कंपोस्ट प्लांट लगाने का निर्णय लिया है। जहां कचरे से जैविक खाद तैयार कर उसे खेती के लिए बाजार में उतारा जाएगा। प्लांट के लिए जगह भी चिह्नित कर ली गई हैं।
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नगर निगम बनने के करीब नौ साल बाद भी यहां के अधिकारी कचरा निस्तारण की व्यवस्था नहीं कर पाए हैं। ऐसे में शहर से प्रतिदिन निकलने वाले टनों कचरे को शहर के बाहर खुले में फेंका जा रहा है। खुले में कचरा फेंके जाने से स्थानीय लोग नाराजगी व्यक्त कर चुके हैं। यह कचरा बीमारियों की वजह बन रहा है। करीब चार वर्ष पहले शासन ने जिला प्रशासन को कचरा निस्तारण के लिए जगह तलाशने के आदेश दिए थे। तत्कालीन डीएम और तमाम एसडीएम को पूरे जनपद में कचरा निस्तारण के लिए जमीन नहीं मिली थी। करीब दो महीने पहले फिर से प्रशासन के द्वारा जमीन की तलाश शुरू की गई, जो पूरी भी हो चुकी है। स्मार्ट सिटी के लिए तैयार किए गए प्रस्ताव में नगर निगम ने दो जगहों पर कंपोस्ट प्लांट लगाने का निर्णय लिया है, जहां खाद का निस्तारण जैविक खाद बनाकर किया जाएगा। नगर निगम वुड कार्विंग क्षेत्र यानी शहर के मंडी क्षेत्र में बायो कंपोस्टिंग प्लांट लगाएगा, जहां मंडी से निकलने वाले हरी सब्जियों और फलों के कचरे तथा वुड यानी लकड़ी के कचरे से जैविक खाद बनाने की योजना है। जैविक खाद बाजार के माध्यम से किसानों को उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा नगर निगम देहरादून रोड पर गांव बट्टनवाला में कंपोस्ट प्लांट लगाएगा, जिसके लिए जमीन भी चिह्नित की जा चुकी है।
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प्रतिदिन निकलता है 150 टन कचरा
शहर से प्रतिदिन करीब 150 टन कचरा निकलता है। इस कचरे के उठान के लिए नगर निगम की टीमें सुबह छह बजे लगती हैं और अपराह्न तीन बजे तक कचरा शहर भर से इकट्ठा कर शहर के बाहर ले जाया जाता है। कचरे की मात्रा पिछले करीब दो दशक में 30 से 50 टन तक बढ़ी है। नगर निगम सूत्रों ने बताया कि वर्ष 2000 तक करीब सौ टन कचरा शहर से निकलता था। मगर शहर की आबादी बढ़ने के साथ कचरा भी बढ़ रहा है, जो अब 150 टन के करीब पहुंच गया है।
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डोर-टू-डोर अलग-अलग लिया जाता है कचरा
पहले नगर निगम साइकिल रेहड़ों के जरिये घरों से कूड़ा इकट्ठा करता था। कचरा मिश्रित होने की वजह से उसका कोई इस्तेमाल नहीं था। मगर नगर निगम ने अब वाहन खरीदे हैं। इन वाहनों में तीन अलग-अलग बॉक्स बने हैं। जब वाहन घरों से कचरा लेने जाते हैं तो कचरे को अलग-अलग कर लिया जाता है और उसके बॉक्स में डाला जाता है। नगर निगम घर-घर से कचरा उठाने के लिए नागरिकों से शुल्क भी वसूलता है।
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एनजीओ पहले से बना रहा खाद
शहर में एक एनजीओ कई साल से काम कर रहा है। एनजीओ को लिंक रोड पर नगर निगम ने अपनी खाली जमीन मुहैया कराई हुई है। जहां एनजीओ के कर्मचारी कचरे को अलग-अलग करते हैं। यहां कचरे से जैविक खाद बनाई जाती है। कचरे से निकलने वाली प्लास्टिक, पॉलीथिन, लोहा और टीन आदि को कबाड़ी को बेच दिया जाता है। मगर एनजीओ द्वारा इस्तेमाल किए जा रहा कचरा कुल कचरे का मुश्किल से दस फीसदी है।
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32 गांवों में नहीं कचरा उठाने की व्यवस्था
शहर से सटे 32 गांवों को मिलाकर ही नगर निगम की स्थापना की गई थी। मगर नगर निगम आज तक इन गांवों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया नहीं करा सका है। इन गांवों में आज भी लोग सड़कों किनारे कचरा (कुरड़ी) डाल रहे हैं। इस कचरे के उठान की कोई व्यवस्था नगर निगम आज तक नहीं कर सका है। संबंधित गांवों के लोग कई बार कूड़े दान रखवाने की मांग कर चुके हैं।
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