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बुखार के प्रकोप से अनजान बना स्वास्थ्य विभाग

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बुखार के प्रकोप से अनजान बना स्वास्थ्य विभाग
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सहारनपुर। बारिश के बाद धीरे-धीरे जिले के खादर इलाके में बुखार अपना पैर पसारने लगा है। मगर, स्वास्थ्य विभाग बुखार के इस प्रकोप से पूरी तरह अनजान है और अपने कागजी आंकड़े ठीक करने में ही जुटा है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जिन इलाकों में पिछले 48 घंटों में आठ मौतें हुई हैं, कुछ साल पहले तक यहां दिमागी बुखार (जापानी इनसेफेलिटिस) का जबरदस्त असर रहा है। इससे अलग जिले भर में बुखार, मलेरिया और डेंगू से हर साल सैकड़ों मौतें हो रही हैं। मगर प्रशासनिक अफसरों की भूमिका बेहद लापरवाह ही रहती है। बारिश के बाद गंगोह, नकुड़ और देवबंद ब्लाक में बुखार का सबसे ज्यादा असर रहता है।
जिले के गंगोह और नकुड़ के खादर क्षेत्र में एक बार फिर बुखार का कहर शुरू हो गया है। पिछले सालों की तरह इस वर्ष भी अब इन क्षेत्रों में बुखार से मरीजों की मौतों का सिलसिला शुरू हो गया है। मगर, स्वास्थ्य विभाग बुखार के इस प्रकोप से अब तक अनजान है। हैरानी की बात यह है कि पिछले कई साल भी इसी मौसम में बुखार ने इन क्षेत्रों में कहर बरपाया था। इसके बाद जिले के अन्य क्षेत्रों में इसका प्रकोप फैल गया। जिले में हर साल बुखार के कहर को लेकर सर्वे और अध्ययन करने वाली मलेरिया रिसर्च सेंटर और राष्ट्रीय संचार रोग संस्थान के विशेषज्ञों ने दावा किया था कि मलेरिया और डेंगू के रूप में बुखार के साथ ही खादर क्षेत्र में यमुना और आसपास के अन्य दूषित पानी के साथ पहुंचने वाले वायरस के हमलों से इन क्षेत्रों में अधिक मौतें होती हैं। खास बात यह भी है कि रक्त की कम मात्रा और कम प्रतिरोधक क्षमता वाले मरीजों के लिए बुखार अधिक खतरनाक साबित होता है।
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एनजीटी ने भी प्रदूषण को माना है बीमारियों का कारण
नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल ने करीब तीन साल पहले यह माना था कि यमुना और आसपास की सहायक नदियों के प्रदूषित होने के कारण मलेरिया, डेंगू से लेकर कैंसर और चर्म से जुड़ी बीमारियां भी बड़े स्तर पर फैल रही हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य विभाग, जल निगम और सिंचाई विभाग के सर्वे में यमुना किनारे बसे 29 से अधिक गांवों के पानी को प्रदूषित और बीमारियां फैलाने वाला बताया गया था।

इन ब्लॉकों में बुखार के मरीजों का सर्वे
मुख्य चिकित्सा अधिकारी बीएस सोढ़ी का कहना है कि बुखार के मामले में संवेदनशील माने जाने वाले गंगोह, नकुड़, देवबंद, सरसावा और नागल ब्लॉक के गांवों में बुखार के सर्वे में अधिक टीमें सक्रिय हैं। बुखार के संदिग्ध मरीजों में मलेरिया, डेंगू या वायरल की जांच के लिए उनके रक्त के नमूनों की जांच होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में स्प्रे करवाया जा रहा है।
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इसी क्षेत्र में रहा है जेई का प्रकोप
गोरखपुर में आक्सीजन की कमी से हुई बच्चों की मौत के बाद जिस जापानी इनसेफेलिटिस ( दिमागी बुखार) बुखार का नाम सामने आया था, उसका प्रकोप भी कई वर्ष तक सहारनपुर में रहा। वर्ष 2002 से 2010 तक करीब दो हजार मौतें इसी बुखार से जिले भर में हुई थी। हालांकि स्वास्थ्य विभाग ने इस बीमारी के खिलाफ अभियान चलाकर अंकुश पाया। मगर, अब भी हर साल मौतों का सिलसिला जारी रहता है। स्वास्थ्य विभाग इन मौतों के पीछे बुखार, मलेरिया, डेंगूू और अन्य बीमारियों को कारण मानता है।
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