दारुल उलूम पर लहराता राष्ट्रध्वज।
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स्वतंत्रता संग्राम में मुख्य भूमिका निभाने वाले दारुल उलूम में 40 साल के बाद तिरंगा फहराया गया। इस अवसर पर मदरसा छात्रों ने देशभक्ति के तराने पेश कर वतन से मोहब्बत का इजहार किया।
30 मई 1866 में हाजी आबिद हुसैन व मौलाना कासिम नानौतवी ने दारुल उलूम की आधारशिला रखी थी। वह समय भारत के इतिहास में राजनैतिक उथल पुथल व तनाव का समय था।
दारुल उलूम और उसके उलमा ने भी जंग-ए-आजादी में बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया था। आजादी के बाद दारुल उलूम में राष्ट्रीय पर्वों पर ध्वजारोहण किया जाता था, लेकिन यह सिलसिला बीच में थम गया था। उस सिलसिले को शुरू करते हुए हुए 40 साल के बाद संस्था के मोहतमिम मौलाना मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी बनारसी ने ध्वजारोहण किया और तिरंगे को सलामी दी। इसके उपरांत शेखुल हिंद लाइब्रेरी में आयोजित कार्यक्रम में जमीयत उलमा-ए-हिंद के राष्ट्रीय अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि देश को आजाद कराने में उलमा, मदरसों और मुसलमानों की कुर्बानियों को कभी भूलाया नहीं जा सकता।
मदनी ने देश के वर्तमान हालात पर कहा कि आज फिरकापरस्त ताकतें मुसलमानों पर तरह तरह के इल्जाम लगा रहे हैं, जबकि हकीकत यह है कि आजादी की लड़ाई में लाखों मुसलमानों ने अपनी जान न्यौछावर की थी। इसके अलावा दारुल उलूम वक्फ में मोहतमिम मौलाना सूफियान कासमी, जामिया इमाम मोहम्मद अनवर शाह में मोहतमिम मौलाना अहमद खिजर शाह मसूदी, दारुल उलूम जकरिया में मोहतमिम मुफ्ती शरीफ खान, जामिया तुश शेख हुसैन अहमद अल मदनी में रिहान अहमद, अशरफुल उलूम में मोहतमिम मुफ्ती इनामुलहक कासमी, जामिया कुदसियात अल इस्लामिया लिलबनात में समाजसेवी सैय्यद हारिस, जामिया उम्मुल कुर्रा में चेयरमैन अंजार अली ने ध्वजारोहण किया। इस दौरान मदरसों में छात्रों ने विभिन्न सांस्कृतिक कार्यक्रमों की प्रस्तुति भी दी।