गुजरात से लाए गए शेरों को इटावा के लॉयन सफारी में इतने जतन के साथ रखा जा रहा है, उसे देखकर इंसानों को भी जलन हो जाए। शेरों के ये जोड़े राजाओं के माफिक रह रहे हैं। आइसोलेटेड एरिया में आराम फरमा रहे हैं ताकि उन्हें न तो कोई डिस्टर्ब करे और न ही इंसानों के आने जाने से कोई बीमारी हो।
जंगल के ये राजा सुविधाओं के साथ यहां के माहौल में खुद को ढालने में जुटे हैं। आखिरकार आने वाले समय में सैलानियों को गिफ्ट के तौर पर शावकों के दीदार कराने की जिम्मेदारी भी इन्हीं पर है। यही नहीं ताजा भैंस का मांस और आरओ वाटर पी रहे हैं।
लॉयन सफारी में एक जोड़ा शेर को आए पांच दिन हो गए हैं। अभी इन शेरों के पास सिवाय कीपर के किसी को जाने की इजाजत नहीं है। सफारी प्रशासन इसे लेकर पूरी तरह सतर्क है। शासन से मिलने वाली हर गाइड लाइन का कड़ाई से पालन हो रहा है। कोर एरिया में बने ब्रीडिंग सेंटर में इन बब्बर शेरों को पूरी निगरानी में रखा गया है।
खाते हैं ताजा मांस, पीते हैं आरओ वाटर
कीपर मुबारक अली शेरों की देखभाल में लगे हैं। उनके सहयोग के लिए तीन प्रशिक्षित सहायकों को भी लगाया गया है। शेरों को भोजन में उनका प्रिय भैंस का मांस खिलाया जा रहा है। इसमें भी खास बात यह कि यह मांस एकदम ताजा होता है। रविवार को सुबह का मांस आ गया तो उसे वापस कर दिया गया। भोजन की जांच ऐसे होती है जैसी किसी वीआईपी के खाने की होती है।
मेल शेर को हर रोज 12 किलो और फीमेल शेर को 10 किलो मांस दिया जा रहा है। शेर 24 घंटे में एक बार भोजन करते हैं। एक खास बात और कि भैंस को काटने से पूर्व पूरी तरह से तसल्ली कर ली जाती है कि भैंस को कोई बीमारी नहीं है। सफारी के अंदर मांस आने पर लेबोरेटरी में उसकी फिर से जांच की जाती है। सब ओके मिलने के बाद ही मांस शेरों को दिया जाता है।
भोजन के साथ पीने के पानी की व्यवस्था शाही है। पानी को शुद्ध करने के लिए ‘केंट’ का आरओ प्लांट लगाया गया है। पाइप लाइन के जरिए यह शुद्ध पानी शेर के पास पहुंचता है। यहां बताते चलें कि यह व्यवस्था चंद दिनों के लिए नहीं है, यह हमेशा लागू रहेगी।
अभी गर्भ से नहीं है शेरनी
केंद्रीय चिड़ियाघर प्राधिकरण (सीजेडए) के दिशा निर्देशों के तहत फिलहाल बब्बर शेरों का यह जोड़ा अस्थाई तौर रखा गया है। तीन सप्ताह तक यह जोड़ा नितांत अलग स्थान पर रहेगा। सीजेडए इसकी जांच परख करता रहेगा। जब सब कुछ ठीकठाक रहेगा, तभी सीजेडए से शेरों को रखने की स्थायी परमीशन हासिल हो सकेगी। बब्बर शेरों को सीजेडए के मानक के तहत रखने के पीछे एक वजह यह भी है कि स्थायी परमीशन मिलने मिल जाए।
बब्बर शेरों को यहां आए पांच दिन हुए हैं। लखनऊ चिड़ियाघर में यह काफी दिन रहे। शेरनी गर्भ से नहीं है। अधिकारी बताते हैं कि शासन की मंशा रही कि एशियाटिक नस्ल लॉयन सफारी में ही पैदा हों। ताकि शावक इस वातावरण के आदी हो सकें।
शेरनी के लिए गर्भधारण का समय पूरे वर्ष रहता है। गर्भ से प्रसव की अवधि 112 से 120 दिन की होती है। इस तरह से शेरनी चार महीने में शावक को जन्म दे देती है। अधिकारियों की माने तो शेरनी का आइडियल समय देखकर ब्रीडिंग कराई जाएगी।