इंदिरा मैराथन से पहले विजेताओं को लेकर की जा रही तमाम कयासबाजियों पर आर्मी के रशपाल सिंह ने मंगलवार को विराम लगा दिया। इलाहाबाद में उन्होंने न सिर्फ इंदिरा मैराथन के 29वें संस्करण में बड़ा उलटफेर किया, बल्कि यह भी साबित कर दिया कि दिल में जोश और जज्बा हो तो हारी हुई बाजी भी जीती जा सकती है।
एक वक्त ऐसा आया, जब वह अपने निकटतम प्रतिद्वंदी और सीनियर एलम सिंह से एक किलो मीटर पीछे थे। दर्शक मान बैठे थे कि कुछ देर में एलम स्टेडियम में प्रवेश करेंगे और जीत का झंडा फहराएंगे। उनके लिए तालियां भी बजने लगी थी लेकिन उस वक्त सबकी आंखें खुली रह गई, जब ट्रैक पर पहला कदम रशपाल का पड़ा। रशपाल के लिए यह भले ही पहली मैराथन रही हो लेकिन उनका तेवर किसी दिग्गज धावक जैसा था।
मैराथन के पहले तीन स्थानों पर आर्मी का कब्जा रहा। तीसरे नंबर पर राजस्थान के अर्जुन राम रहे। वहीं महिला वर्ग में गत वर्ष की विजेता भदोही की ज्योति सिंह को इस बार दूसरे स्थान से संतोष करना पड़ा। पहले नंबर पर रहीं महाराष्ट्र की ज्योति शंकर राव गवते ने प्रतिद्वंदियों को कहीं टिकने ही नहीं दिया। बंगाल की श्यामली सिंह तीसरे स्थान पर रहीं। इससे पूर्व सुबह 6:30 बजे खेल एंव युवा कल्याण मंत्री नारद राय ने आनंद भवन के सामने मैराथन को हरी झंडी दिखाई।
आखिरी वक्त में 'मिल्खा' बन गए रशपाल
इलाहाबाद शहर में मंगलवार को हुई 29वीं इंदिरा मैराथन पूरी तरह रशपाल सिंह के नाम रही। उन्होंने जिस अंदाज में जीत दर्ज की वह हैरतअंगेज तो थी ही, आइंदा दौड़ने वाले धावकों को नई राह दिखा गई। उन्होंने जिस तरह ढाई मिनट में करीब 800 मी दूरी का फासला तय किया, उसने महान धावक मिल्खा सिंह की याद दिला दी। दर्शक भी उन्हें ‘मिलखा’ कहने से खुद को रोक नहीं पाए।
अखिल भारतीय इंदिरा मैराथन में सबसे कम समय में दौड़ पूरी करने का रिकार्ड स्वरूप सिंह के नाम है। उन्होंने 1986-87 में 2:13:57 सेकेंड में दौड़ पूरी की थी। पूर्व दिग्गज धावकों के मुताबिक स्वरूप सिंह ने भले ही सबसे कम समय में दौड़ पूर रिकार्ड बनाया हो, लेकिन इस बार के इंदिरा मैराथन विजेता रशपाल ने आखिरी वक्त में जिस तरह दौड़ लगाई उसकी तुलना किसी से नहीं की जा सकती।
आमतौर पर आखिरी वक्त में धावक अपनी स्पीड बढ़ा नहीं पाते, लेकिन रशपाल ने इस मिथक को भी तोड़ दिया। ढाई मिनट में 800 मीटर की दूरी को खत्म कर देना अपने आप में कमाल है। रशपाल एक मंझे हुए धावक की तरह दौड़े, जबकि यह उनकी पहली मैराथन थी। मानो उन्हें पता था कि एलम को किस जगह पर बीट करना है। वह उसी हिसाब से अपनी स्पीड बनाए हुए थे।
दिग्गजों की मानें तो रशपाल के अंदर स्प्रिंट रनर बनने की भी क्षमता है, क्योंकि जब वह 42 किमी दौड़ने के बाद भी अपनी रफ्तार बढ़ा सकते हैं, तो फिर स्प्रिंट तो उनके लिए आसान खेल है।
जख्मी पैर से मात खा गई ‘उड़न परी’
भदोही की ‘उड़नपरी’ को पैर के जख्म ने धोखा दे दिया। 29वीं अखिल भारतीय इंदिरा मैराथन में पिछले साल की विजेता ज्योति सिंह के मुताबिक हैदराबाद में हुई मैराथन में पैरों में ‘सिन पेन’ हो गया था। इसका असर इस बार की इंदिरा मैराथन में प्रदर्शन पर पड़ा। हालांकि उनके चेहरे पर खिताब न जीत पाने का दर्द नहीं था। ज्योति सिंह के मुताबिक यह खेल है। इसमें हार और जीत तो होती ही रहती है। अभी कई और मैराथन में हिस्सा लेना है।
छह भाई-बहनों में सबसे बड़ी ज्योति कहतीं है कि वह अपने पिता रामआसरे से प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। हौसले और जोश में कोई कमी नहीं है। पिछले बार वह इलाहाबाद इंदिरा मैराथन में प्रथम स्थान पर थी। इस बार भी ऐसा करने का सपना था। फिलहाल आगे वह ओलंपिक में अपनी धाक जमाना चाहती हैं। इसके लिए वह कड़ी मेहनत करने को तैयार है।
बीए की छात्रा ज्योति ने बताया कि वह इंदिरा मैराथन में मिली पुरस्कार राशि को अपनी डाइट पर खर्च करेगी। रामआसरे के मुताबिक ज्योति अगले साल मुंबई में होने वाली मैराथन में हिस्सा लेंगी। यहां प्रदर्शन ठीक रहा तो आगे की रणनीति बनाई जाएगी।