रामपुर। नवाबों के शहर रामपुर के हर मोहल्ले का अपना इतिहास रहा है। नवाबों के संगीत प्रेमी होने की वजह से तबले और ढोलक बनाने का काम भी यहां होता था। उस समय पूछपरख अधिक हाेने से कारीगर भी सराय गेट रोड पर एक बस्ती बनाकर रहने लगे, जिसके बाद इस मोहल्ले का नाम तबलचियान पड़ गया। समय के साथ अब यहां कुछ ही कारीगर बचे हैं, लेकिन मोहल्ले को अभी भी तबलचियान नाम से जाना जाता है।
रामपुर शहर नवाबों का शहर रहा है। यहां करीब 275 साल तक नवाबों का राज रहा। इस दौरान कई नवाब रहे। ज्यादातर नवाब संगीत प्रेमी रहे। उनके दरबार में संगीत की महफिल सजा करती थी। संगीत में इस्तेमाल होने वाले उपकरणों में तबले, वायलयिन, ढोलक, हारमोनियम का भी इस्तेमाल होता था। कारीगर रामपुर में ही तबलों व ढोलक बनाते थे। इतिहासकारों का कहना है कि इसके कारीगरों को सराय गेट के पास बसाया गया था। यहां उस समय 200 से 400 कारीगर होते थे। यहां पर वे तबले और ढोलक बनाने का काम करते थे, तभी से इस मोहल्ले का नाम तबलचियान पड़ गया। रियासतकाल खत्म होने के बाद रामपुर भारतीय गणराज्य में शामिल हो गया, जिसके बाद समय के साथ यहां कारीगर भी चले गए। अब यहां इक्के दुक्के ही कारीगर ही बचे हैं, लेकिन मोहल्ले का नाम अभी तबलचियान के नाम से जाना जाता है।
बोले स्थानीय लोग
-पहले यहां पर तबले बनाने का काम होता था, लेकिन अब यह काम नहीं होता है। तभी से इस मोहल्ले को तबलचियान नाम से जाना जाता है। इसका इतिहास रोचक है। अब समय के साथ ही कारीगर भी नहीं रहे हैं।- संजीव कुमार, स्थानीय निवासी
-तबलचियान मोहल्ले का इतिहास रियासतकाल से जुड़ा हुआ है। यहां के बारे में बुजुर्ग कहते हैं कि यहां पर पहले तबलों के कारीगर रहते थे, लेकिन अब यह कारीगर कम हो गए हैं। मोहल्ले का नाम तभी से तबलचियान पड़ा है।- राम शरण, स्थानीय निवासी