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साहब! मैं गयासुद्दीन..अभी मैं जिंदा हूं 

Fri, 14 Apr 2017 12:25 AM IST
अमर उजाला ब्यूरो/ शाहबाद /रामपुर
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शाहबाद के सुर्मा व्रिकेता गयासुद्दीन जो अपने जिंदा होने के सबूत देते घूम रहे हैं।
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सरकारी सिस्टम कैसे आम आदमी को परेशान करता है इसको देखना है तो बहत्तर साल के गयासुद्दीन से मिल लीजिए। यह बुजुर्ग महीनों से सरकारी दफ्तरों की एड़ियां घिस रहा है। बुजुर्ग पेंशन मिलती थी, अब कागजों में ‘मृत’ है। खुद को जिंदा साबित करने की कवायद में जुटा है। योगी सरकार से उम्मीद बंधी है कि शायद अब सिस्टम सुधरे और वह ‘जिंदा’ हो जाए । जिंदा हो जाएगा तो उसे फिर पेंशन मिलने लगेगी। इस बुढ़ापे में रोटी के लाले हैं। 

 गयासुद्दीन शाहबाद के मोहल्ला बेदान के बाशिंदे हैं। सुर्मा बेचते थे। मौजूदा दौर में लोगों ने सुर्मा खरीदना बहुत कम कर दिया। इस काम से गयासुद्दीन से इतनी आमदनी नहीं हो पाती कि वे दो जून की रोटी जुटा सकें।  2007 में बसपा सरकार में इसकी वृद्धावस्था पेंशन बंध गई थी। एक माह पेंशन भी आई थी। लेकिन उसके बाद से गयासुद्दीन की पेंशन बंद हो गई। जब इसकी जानकारी लेने के लिए गयासुद्दीन तहसील में गए तो पता चला कि कागजों में उन्हें मरा दिखाया गया है। गयासुद्दीन को यकीन नहीं हुआ कि उनके जिंदा रहते ही सरकारी कागजों में उन्हें मृत मान लिया जाएगा।
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वह रामपुर विकास भवन स्थित कार्यालय पहुंचे। वहां यही बताया गया कि कागजों में उनकी मौत हो चुकी है।  तभी से लेकर अब तक वह खुद को कागजों में जिंदा करवाने की जुगत में जुटे हैं। शाहबाद तहसील से लेकर जिले के कार्यालय तक के और अधिकारियों के चक्कर काट-काटकर परेशान हैं। फिलहाल अभी तक उनका काम नहीं हुआ है। सूबे में योगी सरकार आई तो गयासुद्दीन को एक बार उम्मीद बंधी है कि शायब अब उनका काम हो सके। इस बुजुर्ग के न तो अपना कोई घर है और ना ही बेटा है । इस बुढ़ापे में अपना पेट पालना भी दुश्वार है। बुजुर्ग की एक बेटी है जिसकी शादी हो चुकी है। 
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