ऐसे में अगर रामपुर शहर विधानसभा सीट पर उप चुनाव होता है तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह होगी कि वो किसे चुनावी मैदान में उतारे। आजम खां 1977 से सक्रिय राजनीति में हैं। उन्होंने विधानसभा का पहला चुनाव 1977 में लड़ा था, जिसमें उनको हार का सामना करना पड़ा था। आजम खां ने 1980 के विधानसभा चुनाव से जीत का सफर शुरू किया तो 2022 तक जारी है। इस बीच 1996 में एक बार कांग्रेस के प्रत्याशी अफरोज अली खां से विधानसभा चुनाव का हार गए थे। उस वक्त पार्टी ने उनको राज्यसभा भेज दिया था। आजम खां अब तक विधानसभा के 12 चुनाव लड़ चुके हैं, जिसमें से उनको 10 में जीत हासिल हुई थी।
चार बार वो प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री भी रहे हैं। 2019 में उन्होंने रामपुर संसदीय सीट से लोकसभा का चुनाव लड़ा था और भारी मतों से विजयी हुए थे। आजम खां के सांसद बनने की स्थिति में उन्होंने रामपुर शहर विधानसभा की सीट छोड़ दी थी। इस सीट पर हुए उप चुनाव में उनकी पत्नी डॉ. तजीन फात्मा निर्वाचित हुई थीं। हालांकि 2019 में आजम खां, उनकी पत्नी डॉ. तजीन फात्मा और बेटे अब्दुल्ला आजम के खिलाफ कई मुकदमे दर्ज हुए थे। कुर्की का वारंट जारी होने के बाद आजम खां ने डॉ. फात्मा और अब्दुल्ला के साथ कोर्ट में आत्मसमर्पण कर दिया था। इसके बाद तीनों को सीतापुर की जेल भेज दिया गया था।
सभी मुकदमों में जमानत मिलने के बाद सबसे पहले डॉ. फात्मा और अब्दुल्ला आजम जेल से बाहर आए थे। आजम खां लगभग 27 महीने तक जेल में रहने के बाद जमानत पर जेल से बाहर आए हैं। जेल रहते हुए उन्होंने रामपुर शहर सीट से सपा की टिकट पर विधानसभा का चुनाव लड़ा और जीते। विधायक बनने के बाद उन्होंने लोकसभा की सदस्यता छोड़ दी थी। लोकसभा के उप चुनाव में बाजी भाजपा के हाथ में रही। अब जब आजम खां की विधानसभा की सदस्यता चली गई है और रामपुर विधानसभा सीट पर उपचुनाव की सुगबुगाहट शुरू हो गई है तो उनके सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि उनकी इस परंपरागत सीट पर सपा का प्रत्याशी कौन होगा। उनके पुत्र अब्दुल्ला आजम तो पहले से स्वार सीट से विधायक हैं। डॉ. तजीन फात्मा की सेहत ठीक नहीं रहती है।
सियासत में रहा आजम का दबदबा
एक वक्त ऐसा भी था जब आजम खां का प्रदेश की सियासत में दबदबा हुआ करता था। उनकी जुबान से निकली हर बात पत्थर की लकीर हुआ करती थी। मुलायम सिंह यादव उनकी किसी बात को काटते नहीं थे। सपा की पिछली सरकार में तो उनका रूतबा मुख्यमंत्री के बराबर था। उस वक्त राजनीतिक गलियारों में ऐसा कहा जाता था कि यूपी के एक नहीं पांच मुख्यमंत्री हैं। आजम के दबदबे का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है उनकी भैंसों को भी वीआईपी ट्रिटमेंट मिलता था। उनकी भैंसें जब चोरी हो गईं थीं तो एसपी सहित पूरे जिले की पुलिस उनकी तलाश में लग गई थी।
पीएम, सीएम और डीएम पर टिप्पणी पड़ी भारी
आजम खां ने 07 अप्रैल 2019 को लोकसभा चुनाव के दौरान मिलक के खाता नगरिया में जो भाषण दिया था उसमें वो प्रधानमंत्री (पीएम) नरेंद्र मोदी, मुख्यमंत्री (सीएम) और तत्कालीन जिलाधिकारी (डीएम) पर जमकर वार किया था। अपने भाषण में वो शब्दों की मर्यादा लांघ गए जिसके आधार पर उनके खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई गई थी। कोर्ट ने उनके भाषण को नफरती करार देते हुए उनको तीन साल की कैद और छह हजार रुपये जुर्माना अदा करने की सजा सुनाई। दो साल से अधिक की सजा होने के बाद उनकी विधायकी भी चली गई। आजम खां ने सांसद बनने के लिए भाषण दिया था। सांसद तो वो बन गए। लेकिन इस भाषण की बदौलत उनकी विधायकी भी चली गई।
आजम ने तत्कालीन डीएम पर बोला था हमला
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान आजम खां ने मिलक के खाता नगरिया में जनसभा को संबोधित करते हुए तत्कालीन डीएम पर व्यक्तिगत हमला भी बोला था। प्रधानमंत्री , मुख्यमंत्री, चुनाव लड़ रहे अन्य प्रत्याशियों और कुछ प्रशासनिक अधिकारियों के खिलाफ भी टिप्पणी की थी। उनके खिलाफ जो मुकदमा दर्ज हुआ था उसमें कहा गया था कि उन्होंने संवैधानिक पदों पर बैठे व्यक्तियों और अधिकारियों के लिए अपशब्द, धमकी, दंगा भड़काने और वर्ग विशेष से धर्म के नाम पर वोट देने की अपील की थी। वर्ग विद्वेष फैलाने की कोशिश की गई, जो आचार संहिता के उल्लंघन के दायरे में आता है।
भड़काऊ भाषण के आरोप में दर्ज है एक और मुकदमा
2019 के लोकसभा चुनाव के दौरान आजम खां के खिलाफ शहजादनगर थाने में भी भड़काऊ भाषण देने के आरोप में मुकदमा दर्ज हुआ था। इस मुकदमे में उन्होंने कहा था कि कलेक्टर पलेक्टर से मत डरियो इनसे जूते साफ करवाऊंगा। इस मुकदमे में आजम खां के खिलाफ चार्जशीट दाखिल हो चुकी है और मामले की सुनवाई चल रही है।
आजम खां को हुई सजा के फैसले की सराहना
अंबेडकर वादी संस्था नव निर्माण संघ की ओर से शुक्रवार को एक सभा आयोजित की गई। जिसमें संघ के संयोजक रमेश प्रभाकर ने रामपुर की एमपी एमएलए कोर्ट द्वारा सपा नेता आजम खां को दी गई सजा की सराहना की। उन्होंने कहा कि विभिन्न पदों पर बैठे नेता और वीआईपी लोगों को न्यायालय के इस फैसले से सबक लेना चाहिए। इस दौरान राजेश सक्सेना, सोहनलाल,दिनेश कुमार, ताराचंद्र, अशोक कुमार मौजूद रहे।