स्वार। पीपली वन क्षेत्र बीते छह माह में जितना अवैध कटान से उजड़ा है, उतना पिछले तीन दशकों में भी नहीं उजड़ा। वर्ष 1990 से 2000 के बीच खुलेआम खैर की तस्करी के मामले सामने आए थे। समय-समय पर कार्रवाई और मुठभेड़ भी हुईं लेकिन अवैध कटान और तस्करी का सिलसिला पूरी तरह थम नहीं सका। बीते छह माह में अवैध कटान में तीन रेंजर हटाए जाने के बावजूद कटान और तस्करी नहीं रुक पा रही है।
लगभग पांच हजार हेक्टेयर में फैले पीपली वन की अंबरपुर और आर्यनगर बीट से खैर के पेड़ लगभग समाप्त हो चुके हैं। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इतने बड़े पैमाने पर कटान वन विभाग की मिलीभगत के बिना संभव नहीं है। सूत्रों के अनुसार पंजाब में पकड़े गए तस्कर बड़े गिरोह के सदस्य हैं। इनका गिरोह उत्तराखंड, हिमांचल, पंजाब और नेपाल तक फैला हुआ है। डीएफओ की जांच रिपोर्ट में भी सामने आया कि पंजाब से पकड़े गए गिरोह के वन तस्कर को छोड़ा गया है।
चार तस्करों को रामपुर लाते समय दो तस्करों को गाजियाबाद में छोड़े जाने की बात भी सामने आई है। इन दोनों पर तीन लाख का जुर्माना डाल कर वसूली की गई, जिसकी बकायदा रसीदें काटी गईं। रेंजर पर आरोप है कि उन्होंने बिना डीएफओ की जानकारी में लिए यह कार्रवाई की।
वह पंजाब में दी गई दबिश में शामिल नहीं थे। आर्यनगर और अंबरपुर बीट में हुए अवैध कटान की जांच एवं कार्रवाई के बारे में डीएफओ ही जानकारी दे सकते हैं।
ओम प्रकाश राम एसडीओ, स्वार
मुख्यमंत्री को भेजी शिकायत
पीपली बचाओ एक्शन कमेटी के अध्यक्ष अहमद जान ने मुख्यमंत्री को भेजे गए शिकायती पत्र में आरोप लगाया है कि आर्यनगर और अंबरपुर बीट में तैनात सुरक्षा कर्मियों की सांठगांठ से तस्कर अवैध रूप से खैर के पेड़ काटकर लकड़ी बाहर ले जा रहे हैं। सवाल उठाया कि आखिर साढ़े चार सौ क्विंटल खैर पीपली वन से कैसे काट ली गई। इतनी बड़ी मात्रा में लकड़ी के लिए लगभग दो हजार से ढाई हजार पेड़ काटे गए होंगे। इतना बड़ा कटान एक-दो दिन में संभव नहीं। ऐसे में बीट प्रभारी और अन्य वनकर्मी क्या कर रहे थे। क्या गश्त केवल कागजों तक सीमित रही।