रामपुर। सिलईबड़ा कांड का चुनावी परिणामों पर कोई असर नहीं दिखा। चुनाव से ठीक पहले हुए इस प्रकरण ने काफी तूल पकड़ा था, जिससे लग रहा था कि भाजपा को इस बार नुकसान ज्यादा होगा। डैमेज कंट्रोल करते हुए भाजपा ने अपनी पकड़ मजबूत की और इस गांव के साथ ही आसपास के दलित बहुल इलाकों में भी अच्छा प्रदर्शन किया। हालांकि, कई बूथों पर दलित वोट साइकिल को मिला। समाजवादी पार्टी ने इस पीडीए फार्मूला बनाया, जिसके आधार पर चुनाव भी लड़ा। इसका असर रामपुर में भी देखने को मिला। मगर, भाजपा इस बार पिछड़ा व अन्य वोट बैंक को साध पाने में कामयाब होती नहीं दिखी। रामपुर लोकसभा क्षेत्र की बात की जाए तो पिछड़े वर्ग के लोगों ने अपना रुख बदला।
चुनाव से पहले दावे किए जा रहे थे कि मिलक क्षेत्र का सिलईबड़ा गांव में प्रकरण भाजपा को चोट पहुंचा सकता है क्योंकि यहां का दलित खासा नाराज है। बिलासपुर विधानसभा क्षेत्र का यह गांव पिछले दिनों काफी सुर्खियों में रहा। डाॅ. भीमराव आंबेडकर की प्रतिमा लगाने को लेकर हुए विवाद में पुलिस की गोली से एक छात्र की मौत के बाद दलित वोटों को साधने के लिए भाजपा ने शुरुआत में ही काफी प्रयास किए थे।
राज्यमंत्री बलदेव सिंह औलख से लेकर भाजपा के तमाम बड़े नेताओं ने दलित समाज के लोगों को मनाने की कोशिश की। खुद सांसद घनश्याम सिंह लोधी भी गांव पहुंचे थे और भाजपा ने पीड़ित परिवार को मनाने की भरसक कोशिश की। शायद यही वजह रही कि चुनाव में गांव में भाजपा के पक्ष में बंपर वोटिंग हुई।
सिलईबड़ा गांव में बने तीनों बूथों पर भाजपा ने जीत दर्ज की। गांव के बूथ संख्या 368 पर भाजपा को 509 सपा को 97 और बसपा को 90 मत मिले। इसी प्रकार बूथ संख्या 369 पर भाजपा को 293 सपा को 243 बसपा को 117 और बूथ संख्या 370 पर भाजपा को 318 सपा को 188 और बसपा को पांच वोट मिले। कुल मिलाकर गांव में भाजपा को 1120, सपा को 528 और बसपा को 212 वोट मिले।
ये है सिलईबड़ा प्रकरण
मिलक तहसील के सिलईबड़ा गांव में 27 फरवरी को सरकारी जमीन पर दलित समाज के लोगों ने डाॅ. भीमराव आंबेडकर पार्क का बोर्ड लगा दिया था। जिसका गांव के ही कुछ लोगों ने विरोध किया था। बोर्ड हटवाने पहुंची प्रशासनिक टीम और पुलिस के सामने दलित समाज के लोग आ गए थे। आरोप है कि इस दौरान पुलिस की गोली से 10वीं के छात्र सोमेश की मौत हो गई थी। दो लोग घायल हो गए थे। इसके बाद गांव में तनाव हो गया था। अफसरों ने स्थिति को संभाला था। बाद में एक होमगार्ड को गिरफ्तार कर जेल भेजा गया था। अन्य आरोपी पकड़े नहीं गए हैं। इससे दलित समाज में नाराजगी है।