तख्लीक-ए-अदब की ओर से उर्दू को फरोग देने के लिए मुशायरा मुनक्किद किया गया। इसमें शायर और दानिश्नर उर्दू की तरक्की को लेकर फिक्रमंद दिखे। उर्दू की खराब हालत से रूबरू कराया। महफिले मुशायरा में ये अहद दिलाया कि वे अब लिखा-पढ़ी का काम ज्यादातर उर्दू में करेंगे।
शहर के एक मैरिज हाल में मुशायरे का आगाज टांडा पालिका के चेयरमैन शहाबुद्दीन गौरी और आकाशवाणी के डायरेक्टर सरवत उस्मानी ने शमा रोशन कर किया। उन्होंने कहा कि रामपुर में उर्दू की हालत अच्छी नहीं है। इसलिए हमें अहद लेना चाहिए कि ज्यादा से ज्यादा लिखा-पढ़ी का काम उर्दू में किया जाए।
शायरों ने भी अपने कलाम के जरिये उर्दू को फरोग देने की कोशिश की। सईद रामिश ने कलाम पेश किया कि जमाना बीत गया अब तो तुम से तू हो जा, मैं तेरा लहजा हूं तू मेरी गुफ्तगू हो जा। डा. जहीर रहमती ने कलाम पेश किया कि इससे ज्यादा और वो होता भी क्या जलील, सक्के को आज हमने शहंशाह कर दिया।
तनवीर सहरी ने कलाम पेश किया कि क्या कहे हुस्ने यार क्या तू है, सौ गुलाबों की एक खुशबू है। अजीज बकाई ने कलाम पढ़ा कि इस तरफ भी तो आना जाना था, इस तरफ भी तो आया जाया करो। शफी अय्यूब ने ये कलाम पढ़ा कि जिसका अपना कोई नहीं होता, उसका सारा जमाना होता है।
इफ्तेखार ताहिर ने यूं कलाम पढ़ा कि पानी गंगा का हो या जमना का, छान और उबालकर रखिये। इनके अलावा खलील वाहिदी, मंजर वाहिदी, अतीक अफरीदी, जुल्फिकार आदिल, खालिद काशीपुरी, शारिब मुरादाबादी, नेहा इलाहाबादी, बालम निजामी डा. अशफाक जैदी, ओमकार सिंह विवेक, आरिफ रामपुरी, डा.मखमूर काकोरवी ने भी कलाम पेश किया।