आंखों में शहादत का गम और जुबां पर दास्तान-ए-कर्बला। गमगीन माहौल में या हुसैन या हुसैन पुकारते अजादार कर्बला पहुंचे। अजादारों ने छुरियों और जंजीरों का मातम कर अपने खून से कर्बला का गम ताजा किया। बाद में ताजिये कर्बला में सुपुर्द-ए-खाक कर दिए। मोहर्रम का चांद दिखने के साथ ही अजाखानों में शुरू हुए इजहारे गम यौमे आशूरा को कर्बला तक पहुंच गया।
बाद नमाज फज्र इमामबाड़ा खासबाग और किला समेत तमाम इमामबाड़ों में मजलिस हुई। इमामाबाड़ा खासबाग से अजादारों के लश्कर के साथ जरी अकदस का जुलूस कर्बला की जानिब रवाना हो गया। पहली कतार में अजादार हाथों में अलम थामे और उनके पीछे जरी अकदस। अंजुमने नोहाख्वानी कर रही थीं। अजादार या हुसैन या हुसैन पुकार रहे थे।
नौजवान ही नहीं बुजुर्ग और बच्चों ने भी सीनाजनी की। जुलूस सीआरपीएफ ग्रुप सेंटर से आगापुर की जानिब निकला। इमामबाड़ा गुलजारे रफत से निकला ताजिये का जुलूस भी सीआरपीएफ आकर बड़े जुलूस में शामिल हो गया। कर्बला में दाखिल होकर अजादारों ने छुरियों और जंजीरों का मातम कर अपने खून से कर्बला का गम ताजा किया।
अंजुमनों की तरफ से हुसैन की सदाएं गूंजी। कर्बला में आमाल कराया। बाद में रोजे हुसैन में सरकारी ताजिया दफन कर दिया गया। शहर और आसपास के गांवों से आए ताजिये भी कर्बला में सुपुर्द-ए-खाक किए गए। कर्बला में अजादारों ने ताजिया दफनाने के बाद चिरागां किया, न्याज दिलाई और दुआ की। कच्ची कर्बला में भी ताजिये दफनाए गए।